भारत की सर्वोच्च अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और समयबद्ध बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों की लंबी और अनियंत्रित मौखिक बहसों पर रोक लगाने के लिए नया स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू कर दिया है। यह SOP 29 दिसंबर से प्रभावी है और इसका मकसद न्यायिक समय का बेहतर उपयोग करते हुए आम नागरिकों को जल्दी न्याय दिलाना है।
अब घड़ी देखकर होगी बहस
नए नियमों के तहत, सुप्रीम कोर्ट में होने वाली बहस अब तय समय-सीमा में ही पूरी करनी होगी। नोटिस के बाद होने वाली सुनवाइयों से लेकर नियमित मामलों तक, सभी पर यह व्यवस्था लागू होगी। अदालत का मानना है कि इससे हर दिन अधिक मामलों की सुनवाई संभव हो सकेगी और लंबित मामलों का बोझ धीरे-धीरे कम होगा।
वकीलों को पहले बताना होगा बहस का समय
SOP के अनुसार, सीनियर एडवोकेट्स समेत सभी बहस करने वाले वकीलों को यह पहले से बताना अनिवार्य होगा कि वे अपने तर्क रखने में कितना समय लेंगे। यह जानकारी सुनवाई से कम से कम एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट के ‘ऑनलाइन अपीयरेंस स्लिप पोर्टल’ पर देनी होगी। कोर्ट ने साफ किया है कि तय समय से अधिक बहस की अनुमति नहीं दी जाएगी।
लिखित दलीलें भी होंगी सीमित
लंबी फाइलों और बार-बार दोहराए जाने वाले तर्कों से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने लिखित सबमिशन पर भी सीमा तय कर दी है। अब वकीलों को सुनवाई से कम से कम तीन दिन पहले अधिकतम पांच पन्नों का संक्षिप्त लिखित पक्ष दाखिल करना होगा। यह दस्तावेज़ एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड या कोर्ट द्वारा नियुक्त नोडल काउंसल के माध्यम से जमा किया जाएगा और इसकी प्रति विपक्षी पक्ष को भी देनी होगी।
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क्यों माना जा रहा है यह फैसला अहम
अक्सर हाई-प्रोफाइल मामलों में वरिष्ठ वकीलों की लंबी बहसों के कारण जमानत, मुआवजा या आम नागरिकों से जुड़े मामलों की सुनवाई टलती रही है। नए नियमों से जजों को यह स्पष्ट रहेगा कि किस मामले में कितना समय लगेगा, जिससे न्यायिक कैलेंडर अधिक व्यवस्थित हो सकेगा।
CJI सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी
नए SOP के लागू होने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कई बार यह स्पष्ट किया था कि न्यायिक समय एक सीमित सार्वजनिक संसाधन है। उन्होंने कहा था कि अनावश्यक रूप से लंबी मौखिक बहसें गरीब और सामान्य वादियों के साथ अन्याय करती हैं।
11 और 12 दिसंबर की सुनवाइयों के दौरान CJI ने उदाहरण देते हुए बताया था कि कैसे एक विधवा महिला को रेलवे दुर्घटना के मुआवजे के लिए 23 साल तक इंतजार करना पड़ा। उनका कहना था कि हाई-प्रोफाइल मामलों में अंतहीन बहस के कारण ऐसे मानवीय मामलों को पीछे धकेलना पूरी तरह अनुचित है।
न्याय व्यवस्था में बड़ा बदलाव
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी दोहराया कि मुकदमों के निपटारे के लिए अनुमानित समय-सीमा तय करना और एक समान राष्ट्रीय न्यायिक नीति बनाना उनकी प्राथमिकता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कोई भी वकील या वर्ग न्यायिक समय पर विशेष अधिकार का दावा नहीं कर सकता।
