बीकानेर। 10 साल पुराने चेक बाउंस मामले में अपीलीय अदालत ने आरोपी की अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा और जुर्माने को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि केवल चेक को “सिक्योरिटी चेक” बताने भर से आरोपी कानूनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।
अतिरिक्त सेशन न्यायाधीश राजेश कुमार गजरा ने अपने फैसले में कहा कि जब आरोपी स्वयं चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार कर चुका है, तो यह माना जाएगा कि चेक किसी वैध ऋण या देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया था। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी को अपनी बात साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश करने होते हैं।
मामले के अनुसार परिवादी ओमप्रकाश ने आरोप लगाया था कि उसने अच्छे संबंधों के चलते पप्पूराम को निजी जरूरत के लिए चार लाख रुपये उधार दिए थे। इसके बदले आरोपी ने 3.60 लाख रुपये का चेक दिया, जो बैंक में लगाने पर “अपर्याप्त राशि” के कारण बाउंस हो गया। कानूनी नोटिस के बावजूद भुगतान नहीं होने पर मामला अदालत में पहुंचा।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी मानते हुए एक वर्ष तीन माह के कारावास और 4.32 लाख रुपये प्रतिकर देने का आदेश दिया था। आरोपी ने अपील में दावा किया कि चेक केवल सुरक्षा के तौर पर दिया गया था और परिवादी अपनी आर्थिक क्षमता साबित नहीं कर पाया।
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हालांकि अपीलीय अदालत ने कहा कि आरोपी अपने दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज या विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका। अदालत ने यह भी कहा कि केवल सामान्य इनकार या संदेह के आधार पर एनआई एक्ट की धाराओं 118 और 139 के तहत बनी कानूनी उपधारणाओं को खारिज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अंततः ट्रायल कोर्ट के 12 जनवरी 2016 के फैसले को सही मानते हुए आरोपी पप्पूराम की अपील खारिज कर दी।
