बीकानेर। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के कर्मचारियों के बीच विवाद से जुड़े एक मामले में कोर्ट ने परिवादी मनसुख करेला की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि विभागीय और प्रशासनिक कार्यवाही को हर स्थिति में आपराधिक मामला नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब लोक सेवकों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति प्राप्त नहीं की गई हो।
मामले के अनुसार परिवादी ने आरोप लगाया था कि वर्ष 2013 में स्थानांतरण के बाद बीकानेर कार्यालय में जॉइनिंग के दौरान अधिकारियों ने उसके साथ जातिसूचक टिप्पणियां कीं और उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर नहीं करने दिए। साथ ही मिलीभगत से उसका मुख्यालय दूरस्थ साइट पर बदलने का आरोप भी लगाया गया।
परिवादी ने अधिकारियों एस.के. अग्रवाल सहित अन्य के खिलाफ भारतीय दंड संहिता और एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग की थी। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2017 में परिवाद खारिज कर दिया था, जिसके खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की गई।
अतिरिक्त सेशन न्यायाधीश राजेश कुमार गजरा ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि विवाद मूल रूप से विभागीय और प्रशासनिक प्रकृति का था। अदालत ने माना कि आरोपित अधिकारी लोक सेवक थे और कथित घटनाएं उनके सेवा दायित्वों से जुड़ी थीं। ऐसे मामलों में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत अभियोजन स्वीकृति आवश्यक होती है, जो इस मामले में नहीं ली गई।
- Advertisement -
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि विभागीय जांच और एससी-एसटी सेल की जांच में आरोपों को आधारहीन पाया गया था। साथ ही प्रारंभिक शिकायतों में जातिसूचक गालियों का कोई उल्लेख नहीं मिलने को भी अदालत ने महत्वपूर्ण माना।
इन सभी तथ्यों को आधार बनाते हुए कोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका खारिज कर ट्रायल कोर्ट के पूर्व आदेश को बरकरार रखा।
