मोहर्रम अखाड़े में दिखे पारंपरिक करतब
बीकानेर के कुचीलपुरा क्षेत्र में मोहर्रम माह के अवसर पर आयोजित सालाना अखाड़े के दंगल में पारंपरिक खेलों और करतबों का शानदार प्रदर्शन देखने को मिला। कर्बला के शहीद हज़रत इमाम हुसैन और उनके साथियों की याद में आयोजित इस कार्यक्रम में शहरभर के अखाड़ों से जुड़े खलीफा, उस्ताद, शागिर्द और बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल हुए।
कार्यक्रम का आयोजन कुचीलपुरान ताजिया चौक स्थित अखाड़ा परिसर में किया गया, जहां देर रात तक धार्मिक और पारंपरिक गतिविधियों का दौर चलता रहा।
बड़ी संख्या में पहुंचे अखाड़ों के खिलाड़ी
मोहर्रम अखाड़ा कमेटी के तत्वावधान में आयोजित इस आयोजन में शहर के लाइसेंसधारी 13 अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। विभिन्न अखाड़ों के खलीफा, उस्ताद और शागिर्दों ने अपनी कला और परंपरागत युद्ध कौशल का प्रदर्शन कर उपस्थित लोगों का उत्साह बढ़ाया।
कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोगों ने मौजूद रहकर आयोजन का आनंद लिया।
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तलवार और ढाल के हैरतअंगेज करतब
अखाड़े में पारंपरिक खेलों के तहत विभिन्न प्रकार के करतब प्रस्तुत किए गए।
मुख्य आकर्षण रहे:
- तलवारबाजी के प्रदर्शन
- ढाल और तलवार के मुकाबले
- लकड़ी के खेल
- बनेठी के करतब
- रस्सी के पारंपरिक प्रदर्शन
- अन्य शारीरिक कौशल आधारित खेल
खिलाड़ियों ने अनुशासन और परंपरा का परिचय देते हुए अपनी कला का प्रदर्शन किया।
दिवंगत उस्ताद की स्मृति में आयोजन
यह अखाड़ा दिवंगत उस्ताद मरहूम गफ्फार साहब की स्मृति को समर्पित रहा। आयोजन के दौरान उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मौलवी हाजी रेहमत अली ने की। आयोजन में विभिन्न अखाड़ों से जुड़े खलीफा और वरिष्ठ सदस्य भी उपस्थित रहे।
शहरभर के उस्तादों की रही भागीदारी
कार्यक्रम में बीकानेर के विभिन्न मोहल्लों और अखाड़ों से जुड़े कई उस्तादों और खिलाड़ियों ने भाग लिया। इस दौरान अखाड़ा संस्कृति और पारंपरिक खेलों की विरासत को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।
उपस्थित लोगों ने खिलाड़ियों के प्रदर्शन की सराहना की और आयोजन को सफल बनाने में सहयोग दिया।
पुलिस प्रशासन का मिला सहयोग
अखाड़े के दौरान शांति और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस प्रशासन की ओर से भी आवश्यक व्यवस्था की गई। कार्यक्रम शांतिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ और कहीं से भी किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं मिली।
प्रतिभागियों का किया सम्मान
आयोजन के अंत में कमेटी की ओर से सभी खलीफाओं, उस्तादों, शागिर्दों और अतिथियों का सम्मान किया गया। प्रतिभागियों का माल्यार्पण कर उत्साहवर्धन किया गया।
इसके अलावा कर्बला की याद से जुड़े प्रतीक चिन्हों वाले स्मृति चिह्न भी भेंट किए गए।
परंपरा और संस्कृति का संगम
मोहर्रम के अवसर पर आयोजित ऐसे अखाड़े केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि बीकानेर की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक युद्ध कला को जीवंत रखने का माध्यम भी हैं। वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी लोगों को एकजुट करने और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का काम कर रही है।
निष्कर्ष
कुचीलपुरा में आयोजित सालाना मोहर्रम अखाड़े का दंगल श्रद्धा, अनुशासन और परंपरा का अनूठा संगम साबित हुआ। पारंपरिक खेलों और करतबों ने जहां दर्शकों को रोमांचित किया, वहीं आयोजन ने बीकानेर की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत को भी मजबूती प्रदान की।
