ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में उथल-पुथल मच गई है। इस घटनाक्रम के बीच कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भारत सरकार के आधिकारिक रुख पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने एक लेख के जरिए केंद्र सरकार की “चुप्पी” को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।
ईरान-इजरायल टकराव और बढ़ता तनाव
ईरान ने पुष्टि की है कि 28 फरवरी 2026 को तेहरान में हुए हमले में उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इस कार्रवाई को अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। हमले में कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी मारे गए।
इसके बाद ईरान ने 40 दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया और जवाबी हमलों की शुरुआत कर दी। क्षेत्रीय तनाव इतना बढ़ गया कि दुबई, रियाद, कतर और ओमान तक मिसाइल हमलों की खबरें सामने आईं। रूस और चीन ने इस कार्रवाई की निंदा की, जबकि कुछ पश्चिमी देशों ने इसे आत्मरक्षा करार दिया।
भारत सरकार का आधिकारिक रुख
भारत सरकार ने ईरानी संप्रभुता के उल्लंघन या हत्या की सीधे तौर पर निंदा नहीं की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केवल यूएई पर हुए हमले की आलोचना करते हुए शांति और कूटनीति की अपील की। सरकार ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और संवाद के जरिए समाधान निकालने की बात कही।
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सोनिया गांधी ने क्या कहा
सोनिया गांधी ने अपने लेख में लिखा कि भारत की चुप्पी को न्यूट्रल नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि बिना औपचारिक युद्ध घोषणा के किसी देश के प्रमुख नेता की टारगेटेड किलिंग अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के खिलाफ है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब दुनिया की बड़ी लोकतांत्रिक ताकतें स्पष्ट रुख अपनाने से बचती हैं, तो वैश्विक व्यवस्था कमजोर होती है। सोनिया ने प्रधानमंत्री के हालिया इजरायल दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि भारत को संतुलित और सिद्धांत आधारित विदेश नीति अपनानी चाहिए।
कांग्रेस का आधिकारिक रुख
इंडियन नेशनल कांग्रेस ने ईरान की जमीन पर हुए हमलों और लक्षित हत्याओं की निंदा की है। पार्टी का कहना है कि भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से संप्रभु समानता, गैर-हस्तक्षेप और शांतिपूर्ण समाधान के सिद्धांतों पर आधारित रही है।
भारत-ईरान संबंधों का संदर्भ
भारत और ईरान के बीच लंबे समय से रणनीतिक और सभ्यतागत संबंध रहे हैं। 1990 के दशक में कश्मीर मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान की भूमिका का भी जिक्र किया गया है। वहीं हाल के वर्षों में भारत-इजरायल संबंध रक्षा, कृषि और तकनीक के क्षेत्र में मजबूत हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने चुनौती यह है कि वह दोनों देशों के साथ अपने रिश्तों को संतुलित रखते हुए सिद्धांत आधारित कूटनीति कायम रखे।
यह घटनाक्रम केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके असर वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ सकते हैं। आने वाले दिनों में भारत का आधिकारिक रुख और अधिक स्पष्ट हो सकता है।
