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बीकानेर

मोहर्रम 2025 में कब है आशूरा? छुट्टी और परंपरा जानिए

editor
editor Published July 5, 2025
Last updated: 2025/07/05 at 5:19 PM
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मोहर्रम 2025: 6 जुलाई को आशूरा, जानें छुट्टी की तारीखें, परंपरा और इतिहास

Contents
किन देशों में कब मनाया जाएगा आशूरा6 और 7 जुलाई को क्या छुट्टी रहेगी?करबला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमिताजिया परंपरा का इतिहासमातम और नौहे की परंपरामोहर्रम का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्वभारत में गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल

मोहर्रम, इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना, 2025 में 26 जून से शुरू हो गया है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत कई देशों में इसका दसवां दिन – यौम-ए-आशूरा – रविवार, 6 जुलाई 2025 को मनाया जा रहा है। यह दिन इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत की स्मृति में शोक के रूप में मनाया जाता है।

किन देशों में कब मनाया जाएगा आशूरा

देश / क्षेत्र 1 मोहर्रम की शुरुआत 10 मोहर्रम (आशूरा)
भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया 26–27 जून 6 जुलाई (रविवार)
सऊदी अरब, UAE, कुवैत, कतर 25–26 जून 5 जुलाई (शनिवार)
यूरोप, कनाडा 26 जून 5 जुलाई
ईरान, इराक, बहरीन स्थानीय शरीयत अनुसार 2 दिवसीय सार्वजनिक अवकाश

6 और 7 जुलाई को क्या छुट्टी रहेगी?

  • 6 जुलाई 2025 (रविवार) को आशूरा है — यह दिन सप्ताहांत में आता है।

  • 7 जुलाई 2025 (सोमवार) को भारत सरकार और कई राज्यों में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है। इस दिन स्कूल, कॉलेज, बैंक, सरकारी दफ्तर और शेयर बाजार (NSE/BSE) बंद रहेंगे।

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करबला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

सन 680 ई. में करबला (इराक) की धरती पर इमाम हुसैन ने यज़ीद की सत्ता के खिलाफ खड़े होकर बलिदान दिया। उनके साथ 72 साथी भी शहीद हुए। यह लड़ाई आज भी सत्य, न्याय और धार्मिक सिद्धांतों के प्रतीक के रूप में देखी जाती है।


ताजिया परंपरा का इतिहास

“ताजिया”, एक प्रतीकात्मक मीनार या इमाम हुसैन की मज़ार की प्रतिकृति होती है, जिसे शिया मुसलमान खासकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में शोक व श्रद्धा के साथ बनाते हैं।

  • यह परंपरा भारत में मुगल सम्राट अकबर के समय लोकप्रिय हुई।

  • ताजिया को फूल, कपड़े, चाँदी और सजावटी वस्तुओं से सजाया जाता है।

  • 10वें दिन ताजिया का विसर्जन या सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाता है।


मातम और नौहे की परंपरा

मोहर्रम में ताजिया जुलूसों के दौरान लोग “या हुसैन!” के नारे लगाते हैं, सीना पीटते हैं (मातम) और नौहे (शोक गीत) पढ़ते हैं। यह शोक इमाम हुसैन की क़ुर्बानी को सम्मान देने का तरीका है।


मोहर्रम का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व

  • शिया समुदाय इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं।

  • सुन्नी समुदाय 9 और 10 मोहर्रम को रोजा रखता है।

  • यह महीना आत्मबलिदान, सच्चाई और धर्म के प्रति निष्ठा का प्रतीक है।


भारत में गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल

राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में हिंदू समुदाय भी ताजिया बनाने और जुलूसों में हिस्सा लेने की परंपरा निभाता है। यह भारत की सांस्कृतिक एकता और साझी विरासत को दर्शाता है।


निष्कर्ष:
मोहर्रम न केवल एक धार्मिक शोक का अवसर है, बल्कि यह सत्य, न्याय और बलिदान की भावना का स्मरण भी है। 6 और 7 जुलाई को जब देशभर में मोहर्रम मनाया जाएगा, तब यह भी याद रखना ज़रूरी है कि यह महीना केवल मातम नहीं, बल्कि इंसानियत, साहस और सिद्धांतों की प्रेरणा भी देता है।

डिस्क्लेमर (स्पष्टिकरण):

इस लेख में प्रस्तुत सभी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों, धार्मिक परंपराओं, और ऐतिहासिक सन्दर्भों पर आधारित है। हमारा उद्देश्य केवल पाठकों को सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सूचित करना है। इसमें किसी भी धर्म, समुदाय या व्यक्ति की भावना को ठेस पहुँचाना कदापि नहीं है।

त्योहारों से संबंधित तिथियाँ चंद्र दर्शन और स्थानीय प्रशासनिक घोषणाओं पर निर्भर करती हैं, अतः पाठकों से अनुरोध है कि अंतिम निर्णय हेतु अपने क्षेत्र की आधिकारिक अधिसूचनाओं और पंचांगों की पुष्टि अवश्य करें।


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