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एक बौद्ध कैसे बना कश्मीर का पहला शासक

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editor Published September 9, 2024
Last updated: 2024/09/09 at 9:13 AM
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  1. कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक पहले बौद्ध थाः हिंदू राजा को मारकर राजकुमारी से शादी की घाटी में कैसे फैला इस्लाम कश्मीर की कहानी जम्मू-कश्मीर विधानसभा पुन्नाव से पहले दैनिक भास्कर लाया है कनमीर का इतिहास युद्ध और राजनीति को समेटे 5 एपिसोड की स्पेशल सीरीज- कश्मीर की कहानी। आज पहले एपिसोड में कस्मीर के बनने, शुरुआती हिंदू राजाओं और इस्लाम के फैलने की रोचक कहानी आज से करीब 700 साल पहले। कश्मीर में सहदेव नाग का एक हिंदू राजा था। उसे न तो प्रजा की पिसा भी और न ही शासन चलाने में दिलयस्सी। सहदेव के नाम पर उसके प्रधानमंत्री और सेनापति रामचंद्र शासन चलाते। रामचंद्र की बेहद सुंदर और जड़ीन बेटी कोटा भी इसमें उनकी मदद करती। एक दिन कश्मीर में तिब्बत का एक राजकुमार रिंचन पहुंचा। उसके साथ सैकड़ों हथियारबंद सैनिक थे। चिन ने रामचंद्र को बताया कि गृहयुद्ध में उसके पिता मारे जा चुके हैं। वो जोजिला दरें के रास्ते जान बचाकर यहां पहुंचा है। रामचंद्र ने रिचन को पनाह दे दी। मशहूर कश्मीरी इतिहासकार पृथ्वीनाथ कौल बामजई अपनी किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ कक्मीर’ में लिखते हैं कि इसी दौरान 13:20 ईस्वी में जुल्लू नाम के मंगोल सेनापति ने कममीर पर हमला कर दिया। राजा सहदेव विना लड़े ही किस्तयाइ भाग गया। जुल्यू ने 8 महीने तक कस्मीर में खूब उत्पात मचाया। लौटते वक्त दिवासर परगना की बोटी के पास बर्तिले कुपान में सेना समेत दफन हो गया। सब कश्मीर पर सीधे सहदेव के प्रधानमंत्री रहे रामचंद्र का शासन हो गया। तिब्बती शरणार्थी राजकुमार स्चिन ने मौका पाकन विद्रोह कर दिया और रामचंद्र की हत्या करवा दी और कश्मीर की गद्दी पर बैठ गया। उसने रामचंद्र की बेटी कोटा से शादी का प्रस्ताव रखा, लेकिन वो पिता के हत्यारे से शादी को तैयार नहीं थी। बहुत मनुहार के बाद आखिरकार कोटा, रिपन की रानी बनने को राजी हो गई। रिचन खुद को बौद्ध तामा मानता था, रानी कोटा माहती थी कि वो हिंदू बन जाए। हालांकि उसने इस्लाम चर्म अपनाया और इस तरह कश्मीर को पहला मुसितम यासक मिला। आखिर रिंचन ने इस्लाम ही क्यों अपनाया? करमौर की कहानी को 5 चैप्टर में जानते हैं… कश्यप, काशेफ या मध्यांतिक किसने बसाया कश्मीर ? कसमीर के सने से जुड़ी 3 मिवी कथाएं मिलती है पहला- कश्यप ऋषि का किस्सा हिंदू माइथोलॉजी के नीलमत पुराण के मुताबिक कश्मीर घाटी पहले सतीसर नाम की एक विशाल झील थी, जिसमें जलोद्भय नाम का राक्षस रहता था। ब्रह्मा के पोते कश्यप ऋषि ने वराह-मुला की पहाड़ी का एक हिस्सा काटकर कर झील सुख्खा दी और जलोद्धय मारा गया। कस्यप ने वहां के रहने वाले नागों को इंसानों को भी साथ में शाने देने का आदेश दिया। इन्हीं ऋषि कश्यप के नाम पर कश्यप-पुरा बसा, जिसे अब करनीर के नाम से जाना जाता दूसरा- कारोफ जित्र का किस्सा सूफी लेखक ताजा आजम ने 1747 में ‘वाकया-ए-कश्मीर में कश्यप ऋषि की जगह कायेफ को रखकर इस कहानी का इस्लामी स्वरूप पैना किया। इन्हीं आजम के बेटे बयुद्दीन ने तो कश्मीर को सीगे आदम-होचा की कहानी से जोड़ दिया। उनके मुताबिक कश्मीर में रहने वालों को खुद हजरत मूसा ने इबादत करना सिखाया। मूसा की मौत भी कश्मीर में हुई और उनका मकबरा भी गाहीं है। तीसरा- माध्यांटिक नाम के बौद्ध का किस्साः प्रसिद्ध चीनी पात्री ट्रेनसांग के मुताबिक कश्मीर एक झील थी, जिसमें नाग रहते थे। एक बार बुद्ध ने कहा था कि मेरी मृत्यु के बाद एक मध्यातिक नाम का बौद्ध यहां लोगों को बसाकर एक राज्य की स्थापना करेगा। बुद्ध की मृत्यु के 50 साल बाद मख्यांटिक नाम का शिष्य कश्मीर गया और उसने झील सुखा दी। मध्यातिक ने यहां कई बौद्ध मठों की स्थापना की। कश्मीर का पहला ऐतिहासिक साक्षा 1960 के दशक में बुर्जहीम की खुदाई में मिलता है। यह साइट श्रीनगर से करीब 8 किलोमीटर दूर है। खुदाई करने वाली टीम के निदेशक टी. एन. साजांची वहते हैं। कि उस वक्त किसी संगठित धर्म का कोई सबूत नहीं मिलता। इन वैज्ञानिक खोजों ने कामीर के जन्म की कश्यप काफ और मध्यातिक की कहानी पर सवाल खड़े कर दिए। कश्मीर के हिंदू राजा ने महमूद गजनी को उल्टे-पांव दौड़ाया। कश्मीर पर अलग-अलग वंश के बौद्ध और हिंदू राजाओं का शासन रहा। इनमें ललितादित्य का जिक्र बेहद जरूरी है। 724 से लेकर 761 ईस्वी तक उनके शासन को कश्मीर का स्वर्णयुग माना जाता है। ललितादित्य ने 14 वर्ष तक सैन्य अभियान चलाया और अफगानिस्तान, पंजाब, बिहार, बंगाल और ओडिसा तक जीत हासिल की। अमेरिका की विख्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आआंग्रे विक अपनी किताव अल-हिंद में लिखते हैं कि ललितादित्य ने चीन के शिनजियांग प्रांत का भी बड़ा हिस्सा जीत लिया था। राजतरंगिणी में कल्हण लिखते है कि ललितादित्य ने पुल, मठ, नहरें और पनपालकी बनगाई। उस दौरान कई नए शहर भी बसाए गए। उन्होंने नरहरि की एक विशाल प्रतिमा बनवाई, जो चुम्बाकों की मदद से हवा में साती थी। एक 54 हाथ संया विष्णु स्तंभ बनवाया। इसके अलावा भव्य मार्तंड मंदिर का निर्माण भी ललितादित्य ने ही कराया था। नतितादित्य के समय कश्मीर का पहला संपर्क अरब मुसलमानों से हुआ। हालांकि किसी के लिए भी कसमीर में घुसपैठ आसान नहीं थी। यहां तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम था। करीब 250 साल बाद महमूद गजनी (महमूद गजनवी ने कस्मीर पर हमले की ठानी। महमूद गजनी भारत पर हमला करने वाला पहला तुर्की था। उसने 1000 ईस्वी में 1027 ईस्वी के बीच भारत पर 17 बार हमला किया। उसका मकसद छूट करना था, जिसमें यो कामयाब भी हुआ। कस्मीर पर भी उसकी नजर पड़ी। 1015 ईस्वी में उसने पहली बार तीसा मैदान दरें के रास्ते कस्मीर पर हमला किया। उस वक्त कश्मीर में संग्राम राजा का गासन था। गजनी की सेना दुर्गम रास्तों में भटक गई और बाढ़ में भी फंस गई। जबरदस्त प्रतिरोध भी हुआ और गजनी को खाली हाथ लौटना पड़ा। उसका काफी नुकसान हुआ। जसने 1021 ईस्वी में फिर कश्मीर पर हमला किया। 1 महीने तक लगातार कोशिश करने के बाद भी वो लौहकोट की किलाबंदी नहीं भेद सका। घाटी में बर्फबारी शुरू होने वाली थी। गजनी समड़ा गया कि कश्मीर को जीतना मुश्किल है। वी लौटा और फिर कभी कश्मीर की तरफ मुड़कर नहीं आया। इसके बाद के वकश्मीरी राजा कमजोर होते रहे। वो आपने भोग-विलास में इस कदर गरारूफ रहे कि उन्हें अपना राजदड और मुकुट भी विदेशी व्यापारी के यहां गिरवी रखना पड़ा। देवी मूर्तियां पिघलाने वाला कश्मीर का हिंदू राजा ! उत्पल वंश के राजा हर्षदेव ने 1089 से 1111 ईस्ती तक कश्मीर पर शासन किया। इस दौरान फिजुलयार्थी और अणाशी से वो कंगाल ही गया। माना जाता है कि वो इस्लाम से इस कदर प्रभावित हुआ कि मूर्ति पूजा छोड़ दी। उसने कश्मीर में मौजूद मूर्तियों, हिंदू मंदिरों और बौद्ध मठों को भी ध्वस्त कराना शुरू कर दिया। इस काम के लिए ‘देगोत्पतन नायक’ नाम का विशेष पद बनाया। हर्षदेव ने मंदिरों के खजानों को लूट लिया। भगवान और देवियों की सोने और चांदी की मूर्तियों को पिचलाना शुरू कर दिया। तुकों की सेनानायक तक बना दिया। हथिदेव के समकालीन इतिहासकार कल्हण ने उन्हें ‘तुरुच्या’ यानी ‘तुर्क’ इटली के व्यापारी मार्को पौली के यात्रा संस्मरणों से पठा चालता है कि तेरहवीं सदी के अंत तक कश्मीर में मुसलमानों की बस्ती बन चुकी थी। ज्यादातर बाशिंदे कसाई का काम करते थे। हर्षदेव के बाद कश्मीर के लगभग सभी राजाओं के यहां तुर्क सैनिकों के प्रमाण मिलते हैं। चैप्टर 4 एक बौद्ध कैसे बना कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक ! इस आर्टिकल की शुरुआत में आपने तिब्बत से भागकर कश्मीर आए राजकुमार रिपन की कहानी पढ़ी। जिसने शासक रामचंद्र की हत्या करवाकर उनकी बेटी कोटा से शादी कर ली। अब रिंगन के सामने सगाल था कि वो कौन-सा चर्म अपनाए। एक बौद्ध राजा को करमीर की जनता की स्पीकार्यता मुश्किल थी। लेखक अशोक कुमार पांडेग अपनी किताब ‘कश्मीर और कश्मीरी पंडित’ में लिखाते हैं. रिपन हिंदू धर्म अपनाना पाहता था, लेकिन उसके तिब्बती बौद्ध होने की वजह से ब्राह्राणों ने उसे दीक्षित करने से इनकार कर दिया।’ चिन को हिंदू धर्म में शामिल न करने की 3 वजहें गिनाई जाती हैं 1. यो तिब्बती बौद्ध था। 2. उसने अपने ससुर हिंदू राजा रामचंद्र की हत्या की थी। 3. जसे हिंदू धर्म में अपनाया जाता तो जब्ब जाति में शामिल करना पड़ता। ब्राह्मणों के इनकार के बाद रिधान मन की शांति के लिए कवमीर में रह रहे एक सूफी संत बुलबुल शाह से मिलने गया। उनके प्रभाव में आकर उसने इस्लाम अपना लिया और सुल्तान सदरुद्दीन के नाम से कसमीर की नहीं पर बैठा। इस तख रिबन धर्म बदलकर कश्मीर का पहला मुस्लिम शासक सदरुद्दीन बना। हालांकि कई इतिहासकारों का मानना है कि उसके इस फैलाने के पीछे पश्चिम एशिया और कश्मीर के आसपास के इलाकों में इसनाम का बाना प्रभाव था। इस्लाम अपनाना राजनीतिक रूप से ज्यादा सुरक्षित था। स्थिन के चचेरे ससुर रावणचंद्र को भी बुलबुल शाह ने इस्लाम कबूल करवाया। इसके अलावा सिंचन के साथ आए बौद्ध सैनिक, शासन-प्रशासन के कई बड़े अधिकारी भी बुलबु थाह के प्रभाव में आकर मुस्लिम बने। श्रीनगर की पहली मस्जिद भी स्चिन उर्फ सुलतान सद्दीन ने बनाई थी। हालांकि स्थिन सुकून से शासन नहीं कर सका। 1323 ईस्वी में उसकी मौत हो गई। कश्मीर की गड़ी पर कश्मीर छोडकर भागे राजा सहदेव के भाई उदयनदेव बैठा और रचन की पत्नी कौटा रानी की शादी करने पर मजबूर किया। 1338 ईस्वी में उदयनदेव की मुल्यु हुई तो रिचन के मंत्री रहे साहमीर ने सत्ता पर कब्जा किया। इस तरह कश्मीर में पहले मुस्लिम वंश (बारहमीर क्स) की स्थापना हुई। इस यज्ञ में 220 साल तक शासन किया। शाहगीर चैप्टर 5 कश्मीर में तलवार के जोर से इस्लाम का बढ़ता वर्चस्व वंश का सबसे विवादित शासक सुल्तान सिकदर था। थी 1389 में गद्दी पर बैठा। करमीरी विद्वान प्रेमनाय बजाज उसके शासान को कश्मीर के इतिहास का सबसे काला धब्बा मानते हैं। सिकंदर के शासन में प्रमुख ईरानी सूफी संत सोयद अली हमदानी के बेटे ससैय्यद मुहम्मद हमदानी कश्मीर आए। सुल्तान ने उनके लिए खानकाह का निर्माण कराया। इतिहासकार जोनराज लिखाते हैं कि सुल्तान शिकटर धर्म के नरों में चूर था। उसने सुहाभट्ट नाम के ब्राह्मण को अपना मुख्य सलाहकार बनाया। सूफी संत सैय्यद हमदानी ने सुग्राभट्ट को मुस्लिम बनाकर मलिक सैफुद्दीन नाम दिया और उसकी बेटी से निकाह कर लिया। सुहाभट्ट उर्फ बीफुद्दीन के सुझाव पर सुल्तान ने कश्मीर के सभी ब्राह्मणों और विद्वानों की मुसलमान बनाने का आदेश दिया। इस्लाम न अपनाने वालों से चाटी छोड़कर जाने को कड़ा गया। उसके शासन में मंदिर तोड़ने का अभियान चला। सोने-चांदी की मूर्तियां शाही टकसाल में गलाकर सिवतों में बदल दी गई। 1420 ईस्वी में सुल्तान सिकंदर का बेटा जैनुल आबदीन नही पर बैठा। वो अपने पिता की धार्मिक कट्टरता से शिकुल उलट था। उसने मंदिरों को फिर से बनवाया। कश्मीर से निकाले गए ब्राह्मणों की वापसी की कोशिश की। जजिया कर हटा दिया। गोहत्या पर रोक लगा दी। जैनुल माबदीन शश्मीरी, फारसी, संस्कृत और अरबी का विद्वान था। उसके आदेश पर महाभारत और कल्हण की सजतरंगिणी का फारसी में अनुवाद किया गया। शिव भट्ट उसके निजी चिकिलाक और सलाहकार थे। उसने कई हिंदुओं

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editor September 9, 2024
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