हज यात्रा से लौटने की खुशी में आयोजित दावत के दौरान हुए जानलेवा हमले के मामले में अदालत ने चार आरोपियों को राहत देने से इनकार कर दिया है। अपर सेशन न्यायाधीश कृष्ण कांत ने मामले की सुनवाई के बाद अमन, समरोज, अयान अली और जफर अली की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि मामले की गंभीरता और आरोपियों के आपराधिक रिकॉर्ड को देखते हुए इस स्तर पर जमानत देना उचित नहीं माना जा सकता।
यह मामला बीकानेर के मुक्ताप्रसाद नगर थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। चारों आरोपियों ने पहले ट्रायल कोर्ट में जमानत के लिए आवेदन किया था, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने सेशन कोर्ट का रुख किया।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि आरोपियों को पुरानी रंजिश के चलते झूठा फंसाया गया है। उनका कहना था कि परिवादी पक्ष के खिलाफ पहले से एक अन्य मामला दर्ज है, जिसके कारण बदले की भावना से यह मुकदमा दर्ज कराया गया। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि घायलों को गंभीर नहीं बल्कि साधारण चोटें आई हैं और आरोपियों पर ऐसे अपराध का आरोप नहीं है, जिसमें मृत्युदंड या आजीवन कारावास का प्रावधान हो।
वहीं, राज्य सरकार और परिवादी पक्ष की ओर से जमानत का कड़ा विरोध किया गया। अदालत को बताया गया कि हज से लौटने की दावत के दौरान आरोपी कथित रूप से नशे की हालत में पहुंचे। विवाद होने के बाद वे 50 से 60 लोगों के साथ दोबारा मौके पर आए और चाकू, मूसली तथा लकड़ियों से हमला कर दिया। इस घटना में सोहेल खान के सिर पर गंभीर चोट आई, जबकि जाकिर हुसैन, आमिर और अजीज भी घायल हो गए।
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सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष मेडिकल रिपोर्ट और उपचार से जुड़े दस्तावेज भी पेश किए गए। रिकॉर्ड के अवलोकन के बाद अदालत ने माना कि सोहेल खान के सिर पर गंभीर चोट आई थी, जिसके चलते कई टांके लगाने पड़े। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि यदि समय पर उपचार नहीं मिलता तो स्थिति और अधिक गंभीर हो सकती थी।
अदालत ने सुनवाई के दौरान यह भी पाया कि चारों आरोपियों के खिलाफ पहले से मारपीट सहित अन्य आपराधिक मामले दर्ज हैं। न्यायालय ने इसे जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण आधार माना और कहा कि ऐसे मामलों में आरोपियों को राहत देना न्यायहित में नहीं होगा।
इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने चारों आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। मामले में राज्य सरकार की ओर से अपर लोक अभियोजक किशनलाल भादू और परिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता लीलाधर भाटी ने पैरवी की।
