लोकसभा सीटों के परिसीमन को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है। दक्षिणी राज्यों द्वारा लंबे समय से जताई जा रही आशंकाओं और उत्तर-दक्षिण प्रतिनिधित्व के संतुलन की चुनौती के बीच प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) के एक वर्किंग पेपर ने नया मॉडल पेश किया है। इस मॉडल में लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 824 करने का प्रस्ताव रखा गया है।
इस अध्ययन को ईएसी-पीएम की सदस्य डॉ. शमिका रवि और भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई) के प्रोफेसर मुदित कपूर ने तैयार किया है। रिपोर्ट का उद्देश्य ऐसा परिसीमन मॉडल सुझाना है जिससे राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बना रहे और बड़े पैमाने पर राजनीतिक असंतुलन पैदा न हो।
543 से बढ़कर 824 हो सकती हैं लोकसभा सीटें
प्रस्तावित मॉडल के अनुसार वर्तमान 543 लोकसभा सीटों में से 373 सीटों को बिना किसी बदलाव के यथावत रखा जाएगा। केवल 170 संसदीय क्षेत्रों का पुनर्गठन कर नई सीटें बनाई जाएंगी।
रिपोर्ट के मुताबिक:
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- 59 लोकसभा सीटों को दो हिस्सों में विभाजित किया जाएगा।
- 111 सीटों को तीन हिस्सों में बांटा जाएगा।
- इस प्रक्रिया से 281 नई सीटों का सृजन होगा।
- कुल लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 824 हो जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अधिकांश क्षेत्रों में मौजूदा राजनीतिक संतुलन प्रभावित नहीं होगा और परिसीमन का प्रभाव केवल लगभग एक-तिहाई सीटों तक सीमित रहेगा।
केवल जनसंख्या नहीं, कई अन्य मानकों को भी मिलेगा महत्व
वर्किंग पेपर में स्पष्ट किया गया है कि सीटों के पुनर्गठन का आधार सिर्फ जनसंख्या नहीं होगा। इसके लिए 2009 से 2024 तक के लोकसभा चुनावों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है।
परिसीमन के लिए प्रस्तावित प्रमुख मानक:
- संसदीय क्षेत्र का आकार
- शहरीकरण का स्तर
- अनुसूचित जाति (SC) आबादी
- अनुसूचित जनजाति (ST) आबादी
- भाषाई विविधता
- मतदान केंद्रों की उपलब्धता
रिपोर्ट के अनुसार इन कारकों का सीधा संबंध मतदान प्रतिशत और प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता से है।
उत्तर-दक्षिण विवाद को संतुलित करने की कोशिश
लोकसभा परिसीमन को लेकर सबसे बड़ी चिंता दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी में संभावित कमी को लेकर रही है। हालांकि प्रस्तावित मॉडल में दावा किया गया है कि प्रतिनिधित्व का संतुलन लगभग बरकरार रहेगा।
दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी
- वर्तमान हिस्सेदारी: 23.7 प्रतिशत
- प्रस्तावित हिस्सेदारी: 23.6 प्रतिशत
इन राज्यों में शामिल हैं:
- तेलंगाना
- आंध्र प्रदेश
- कर्नाटक
- तमिलनाडु
- केरल
प्रमुख उत्तर एवं पश्चिमी राज्यों की हिस्सेदारी
- वर्तमान हिस्सेदारी: 45.6 प्रतिशत
- प्रस्तावित हिस्सेदारी: 45.2 प्रतिशत
इन राज्यों में शामिल हैं:
- उत्तर प्रदेश
- बिहार
- राजस्थान
- मध्य प्रदेश
- गुजरात
- महाराष्ट्र
रिपोर्ट का दावा है कि इस मॉडल से किसी भी क्षेत्र को बड़ा राजनीतिक नुकसान नहीं होगा।
राजस्थान में 25 से बढ़कर 38 हो सकती हैं सीटें
राजस्थान लोकसभा सीटों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
प्रस्तावित बदलाव
- वर्तमान सीटें: 25
- प्रस्तावित सीटें: 38
- नई सीटें: 13
जिन संसदीय क्षेत्रों के विभाजन का सुझाव दिया गया है:
- जयपुर
- जयपुर ग्रामीण
- सीकर
- जोधपुर
- उदयपुर
- चूरू
- बांसवाड़ा
मध्य प्रदेश में 29 से बढ़कर 44 सीटों का प्रस्ताव
प्रस्तावित बदलाव
- वर्तमान सीटें: 29
- प्रस्तावित सीटें: 44
- नई सीटें: 15
संभावित रूप से विभाजित होने वाले क्षेत्र:
- रतलाम
- धार
- इंदौर
- भोपाल
- बालाघाट
- मंडला
- ग्वालियर
- भिंड
छत्तीसगढ़ में 11 से बढ़कर 17 सीटें
प्रस्तावित बदलाव
- वर्तमान सीटें: 11
- प्रस्तावित सीटें: 17
- नई सीटें: 6
विभाजन के लिए चिन्हित क्षेत्र:
- सरगुजा
- कांकेर
- दुर्ग
छोटे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को भी फायदा
रिपोर्ट में मिजोरम, सिक्किम, पुडुचेरी, लद्दाख, अंडमान-निकोबार, नागालैंड, चंडीगढ़ और लक्षद्वीप जैसे छोटे राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों की लोकसभा सीटों को दोगुना करने का सुझाव दिया गया है।
2027 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की सिफारिश
वर्किंग पेपर में सुझाव दिया गया है कि अगला परिसीमन 2027 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जाए। इसके साथ ही सभी बड़े राज्यों में लगभग 50 प्रतिशत सीट वृद्धि का प्रस्ताव रखा गया है।
रिपोर्ट का अनुमान है कि नए परिसीमन मॉडल के लागू होने के बाद मतदान प्रतिशत में लगभग 2.3 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।
निष्कर्ष
ईएसी-पीएम का यह प्रस्तावित मॉडल लोकसभा परिसीमन के सबसे संवेदनशील मुद्दे—उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व संतुलन—को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। सीटों की संख्या में बड़ी वृद्धि के बावजूद मौजूदा संसदीय क्षेत्रों में सीमित बदलाव का सुझाव इस मॉडल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता माना जा रहा है। यदि भविष्य में इस दिशा में कदम बढ़ते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व की संरचना में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
