प्रज्ञालय संस्थान की ओर से युवा पीढ़ी में साहित्य और विशेष रूप से बाल साहित्य के प्रति रुचि विकसित करने के उद्देश्य से गुरुवार को एक साहित्यिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। महान साहित्यकार और नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की जयंती के अवसर पर लक्ष्मीनारायण रंगा सृजन-सदन में सुबह 9:30 बजे ‘मातृभाषा एवं बाल साहित्य’ विषय पर यह कार्यक्रम आयोजित हुआ।
कार्यक्रम में राजस्थानी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार कमल रंगा ने विषय प्रवर्तन करते हुए कहा कि बाल साहित्य का सृजन अपने आप में एक बड़ी जिम्मेदारी और चुनौती है। उन्होंने कहा कि जब बाल साहित्य बालकों की मातृभाषा में लिखा जाता है, तब उसका प्रभाव और महत्व कई गुना बढ़ जाता है। कमल रंगा ने बताया कि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भी अपनी मातृभाषा बांग्ला में उत्कृष्ट बाल साहित्य की रचना की थी, जिसे बाद में विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवादित किया गया और पूरे देश में पढ़ा गया।
उन्होंने टैगोर की प्रसिद्ध रचनाओं ‘काबुलीवाला’, ‘बादल और लहरें’ तथा ‘छोटा-बड़ा आदमी’ का उल्लेख करते हुए कहा कि ये रचनाएं आज भी बाल साहित्य की दृष्टि से प्रेरणादायक मानी जाती हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि बाल साहित्य बच्चों के मनोविज्ञान, उनकी रुचियों और वर्तमान समय के सामाजिक संदर्भों को ध्यान में रखकर लिखा जाना चाहिए।
गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षाविद् राजेश रंगा ने की। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों में पुस्तकें पढ़ने की आदत कम होना चिंता का विषय है। पुस्तकें बच्चों की सच्ची मित्र होती हैं, जो उनकी कल्पनाशक्ति को विकसित करने के साथ-साथ भावनात्मक रूप से भी उन्हें मजबूत बनाती हैं।
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करूणा क्लब के हरिनारायण आचार्य ने अपने संबोधन में कहा कि बच्चों को बाल साहित्य पढ़ने के साथ-साथ अपनी मातृभाषा के प्रति भी जागरूक रहना चाहिए और उसे दैनिक जीवन में अपनाना चाहिए।
कार्यक्रम में हेमलता व्यास, नवनीत व्यास, कन्हैयालाल पंवार और राहुल सहित कई वक्ताओं ने भी अपने विचार साझा किए और बाल साहित्य के महत्व को रेखांकित किया। गोष्ठी का संचालन आशीष रंगा ने किया, जबकि अंत में भवानी सिंह राठौड़ ने सभी अतिथियों और उपस्थितजनों का आभार व्यक्त किया।
