राजस्थान में बहुचर्चित सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती-2021 को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। Supreme Court of India ने चयनित अभ्यर्थियों की याचिका को खारिज करते हुए साफ कर दिया है कि यह भर्ती रद्द ही रहेगी। अदालत के इस फैसले के बाद भर्ती प्रक्रिया को लेकर चल रही अनिश्चितता पर विराम लग गया है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि राजस्थान से हर महीने भर्ती घोटालों से जुड़े कई मामले सामने आ रहे हैं। अदालत ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि एसआई भर्ती में पेपर लीक एक “सिस्टमैटिक फेल्योर” का उदाहरण है।
कोर्ट ने यह भी माना कि जब भर्ती प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में आ जाए, तो उसमें शामिल अभ्यर्थियों को सही और गलत के आधार पर अलग करना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं होता।
RPSC पर सवाल
इस मामले में Rajasthan Public Service Commission के एक सदस्य की गिरफ्तारी का भी जिक्र किया गया। अदालत ने इसे सिस्टम में गहरी खामियों का संकेत बताया। साथ ही यह भी कहा गया कि पेपर लीक जैसे मामलों में पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता खत्म हो जाती है।
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हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर
गौरतलब है कि पहले Rajasthan High Court की एकलपीठ ने अगस्त 2025 में इस भर्ती को रद्द किया था, जिसे बाद में खंडपीठ ने भी बरकरार रखा। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी उसी निर्णय को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी है।
अभ्यर्थियों की दलीलें
चयनित अभ्यर्थियों की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि केवल 6.3 प्रतिशत अभ्यर्थी ही संदिग्ध पाए गए थे, इसलिए पूरी भर्ती रद्द करना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि सैकड़ों अभ्यर्थी दो साल से सेवा दे रहे हैं, जिन पर सरकार का खर्च हो चुका है।
वहीं, विरोध पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि जब पेपर पहले ही लीक हो चुका था, तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता खत्म हो गई और ऐसे में चयन को सही नहीं ठहराया जा सकता।
चेयरमैन की अपील भी खारिज
अदालत ने तत्कालीन RPSC चेयरमैन संजय श्रोत्रिय की अपील को भी खारिज कर दिया। उन्होंने अपने खिलाफ की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह मामला सार्वजनिक हित से जुड़ा है और कोई टिप्पणी नहीं हटाई जाएगी।
क्या संकेत देता है फैसला
यह निर्णय साफ करता है कि न्यायपालिका भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर बेहद सख्त रुख अपना रही है। पेपर लीक जैसे मामलों में अब आंशिक सुधार नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को निरस्त करना ही प्राथमिक विकल्प माना जा रहा है।
