बीकानेर, जिसे छोटी काशी के नाम से जाना जाता है, अपनी तंग गलियों और प्राचीन मोहल्लों में छिपी आस्था और परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां स्थित मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि सदियों पुराने इतिहास और लोकविश्वासों के जीवंत प्रतीक हैं।
डागा चौक स्थित नरसिंह मंदिर इस आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है, जिसका इतिहास लगभग 450 वर्ष पुराना बताया जाता है। मंदिर से जुड़े पंडित मनोज कुमार पांडिया के अनुसार, पहले यहां माताजी का मंदिर था, जिसका संचालन डागा परिवार करता था। लोककथा के अनुसार, एक साधु के पास रखी नरसिंह भगवान की प्रतिमाओं ने माताजी के भोग को बार-बार जूठा कर दिया, जिसे दिव्य संकेत माना गया। इसके बाद हुए निर्णय में भगवान नरसिंह को मंदिर में विराजमान किया गया और तभी से उनकी विशेष पूजा शुरू हुई।
पिछले करीब 100 वर्षों से यहां नरसिंह चतुर्दशी के अवसर पर भगवान नरसिंह के अवतार और हिरण्यकश्यप वध की भव्य लीला का मंचन किया जाता है। इस वर्ष इस परंपरा का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है, जिसे लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखा जा रहा है।
वहीं, लखोटिया चौक स्थित नरसिंह मंदिर भी अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है, जिसका इतिहास बीकानेर की स्थापना से भी पहले का बताया जाता है। यहां प्रारंभ में नाथ परंपरा के साधु-संतों द्वारा पूजा की जाती थी, जो बाद में महंत परंपरा और फिर स्थानीय लखोटिया समाज के हाथों में आ गई। समय के साथ यहां एक मोहल्ला समिति का गठन हुआ, जो मंदिर और उसकी संपत्तियों का संचालन करती है।
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इस मंदिर की विशेष परंपरा भी नरसिंह लीला का आयोजन है, जिसे अत्यंत प्राचीन माना जाता है। यहां आज भी भगवान नरसिंह और हिरण्यकश्यप के मुखौटे मुल्तानी मिट्टी से बनाए जाते हैं, जो इसकी परंपरागत विरासत को जीवित रखते हैं।
