

बीकानेर में सोमवार को गणगौर पर्व की शाही सवारी निकाली गई, जिसमें राजपरिवार की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को निभाया गया। जूनागढ़ से गवर राजशाही वैभव के साथ निकली और चौतीना कुआं पर पानी पिलाने की रस्म अदा की।
इसके साथ ही बीकानेर के विभिन्न इलाकों में गणगौर मेले लगे, जहां हजारों महिलाओं ने अपनी गणगौर को पानी पिलाने की रस्म निभाई।
गणगौर उत्सव का महत्व
होली के अगले दिन से ही बीकानेर में गणगौर की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। कुंवारी लड़कियां अपने घरों की छतों पर गणगौर मांडती हैं। समय के साथ इस कला को भी निखरने का अवसर मिला है। सोलह दिन की पूजा के बाद गणगौर मेले के दिन गवर को ईसर के साथ विदा किया जाता है।
सोमवार को यह परंपरा पूरे राजकीय सम्मान और भव्यता के साथ निभाई गई। गवर को एक कन्या की तरह पूरे सम्मान के साथ साज-सज्जा कर विदा किया गया।
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राजपरिवार की शाही सवारी
सोमवार को गणगौर की शाही सवारी जूनागढ़ से रवाना हुई। बैंड-बाजों की धुन के साथ राजपरिवार की महिलाएं गवर को सिर पर उठाकर चौतीना कुआं तक लेकर गईं। यहां गवर को पानी पिलाने की रस्म निभाई गई, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए।

व्यवस्था और सुरक्षा प्रबंध
जिला प्रशासन ने पूरे आयोजन के लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था की थी। पुलिस और यातायात विभाग ने सवारी के सुचारू संचालन के लिए विशेष इंतजाम किए।
इसके अलावा, जस्सूसर गेट, चौतीना कुआं और ढ्ढढों के चौक में भव्य गणगौर मेला आयोजित किया गया। यहां हजारों महिलाओं ने गणगौर की पूजा की। मेले में खाने-पीने की विभिन्न दुकानों के साथ बच्चों के लिए झूले और मनोरंजन के अन्य साधन उपलब्ध रहे।
राजशाही परंपरा का अनूठा संगम
हर साल की तरह इस बार भी गणगौर महोत्सव ने बीकानेर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत किया। राजपरिवार की यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था बल्कि सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है।