

बीकानेर: राजस्थान में गणगौर महोत्सव की धूम रहती है, लेकिन बीकानेर में मनाई जाने वाली गणगौर दौड़ इस पर्व को और खास बना देती है। यहां पुरुष अपने सिर पर गणगौर प्रतिमा रखकर दौड़ लगाते हैं, जो देखने वालों को रोमांचित कर देती है।
रियासतकाल से जारी है यह परंपरा
चैत्र शुक्ल चतुर्थी के दिन आयोजित होने वाली यह दौड़ रियासतकाल से चली आ रही परंपरा है। गणगौर दौड़ की शुरुआत चौतीना कुआं से होती है और यह भुजिया बाजार पर समाप्त होती है। इस बार गणगौर दौड़ 1 अप्रैल को आयोजित होगी।
12 दिन तक चलता है पूजन उत्सव
गणगौर पूजन का यह अनुष्ठान धुलंडी के दिन से शुरू हो जाता है, जब पुरुष मंडलियां गणगौर के पारंपरिक गीतों का गायन करती हैं। चैत्र शुक्ल चतुर्थी से पहले शीतला अष्टमी को गणगौर प्रतिमा का दर्शन-पूजन होता है। इसके बाद प्रतिमा की रंगाई, शृंगार और विभिन्न रस्में निभाई जाती हैं।
युवक सिर पर रखते हैं प्रतिमा, एक-दूसरे को सौंपते हैं
चैत्र शुक्ल चतुर्थी को जब पूर्व बीकानेर राज परिवार की गणगौर शाही लवाजमें के साथ चौतीना कुआं पहुंचती है, तब भादाणी समाज के युवक गणगौर प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर दौड़ लगाते हैं। इस दौरान कोटगेट की ओर दौड़ते हुए वे गणगौर प्रतिमा को एक-दूसरे को सौंपते रहते हैं, लेकिन दौड़ कभी रुकती नहीं।
- Advertisement -

इतिहास से जुड़ी गणगौर दौड़ की परंपरा
इतिहासकार प्रो. भंवर भादाणी के अनुसार, यह परंपरा महाराजा रायसिंह के शासनकाल में शुरू हुई थी। उस समय दीवान कर्मचंद बच्छावत ने एक आक्रमण के दौरान गणगौर प्रतिमा भादोजी को सौंपी थी। भादोजी इस प्रतिमा को लेकर दौड़ते हुए निकल गए थे, और उसी घटना की याद में आज भी यह गणगौर दौड़ आयोजित की जाती है।
यह परंपरा बीकानेर की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है और गणगौर महोत्सव को अनूठा बनाती है।