लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कांग्रेस समेत इंडी गठबंधन पर जमकर हमला बोला था। इस दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि यह लोग वन ईयर वन पीएम फॉर्मूला बना रहे हैं। यानी एक साल एक पीएम, दूसरे साल दूसरा पीएम, तीसरे साल तीसरा पीएम, चौथे साल चौथा पीएम, पांचवें साल पांचवां पीएम। हालांकि, अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि ऐसा पहली बार नहीं होगा। इससे पहले भी करीब दो साल के अंदर चार पीएम बदल चुके हैं।
आइए जानते हैं 22 महीने के भीतर में चार प्रधानमंत्री कैसे बदले-
देश के इतिहास में प्रधानमंत्रियों का बदलना सन् 1996 से शुरू हुआ। दरअसल, सन् 1996 में देश में लोकसभा चुनाव हुए थे। 16 मई 1996 तक पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री रहे। उसके बाद राजनीति में ऐसा बदलाव आया कि 16 मई 1997 आने तक देश ने चार प्रधानमंत्री देख लिए थे।
साल में चार पीएम बदले
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1996 में ग्यारहवीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए थे। चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री का पद संभाला। हालांकि 13 दिन ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाए थे और बहुमत साबित न कर पाने की वजह से इस्तीफा देना पड़ा था।
जनता दल के नेता एचडी देवेगौडा ने एक जून को संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार का गठन किया था, लेकिन उनकी सरकार भी 10 महीने ही चली।
Elections: जब देश में 22 महीने में ही बदल गए थे चार पीएम, जानें कैसा था एक हाथ से दूसरे हाथ जाती सत्ता का हाल
लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कांग्रेस समेत इंडी गठबंधन पर जमकर हमला बोला था। इस दौरान उन्होंने आरोप लगाया कि यह लोग वन ईयर वन पीएम फॉर्मूला बना रहे हैं। यानी एक साल एक पीएम, दूसरे साल दूसरा पीएम, तीसरे साल तीसरा पीएम, चौथे साल चौथा पीएम, पांचवें साल पांचवां पीएम। हालांकि, अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि ऐसा पहली बार नहीं होगा। इससे पहले भी करीब दो साल के अंदर चार पीएम बदल चुके हैं।
आइए जानते हैं 22 महीने के भीतर में चार प्रधानमंत्री कैसे बदले-
देश के इतिहास में प्रधानमंत्रियों का बदलना सन् 1996 से शुरू हुआ। दरअसल, सन् 1996 में देश में लोकसभा चुनाव हुए थे। 16 मई 1996 तक पीवी नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री रहे। उसके बाद राजनीति में ऐसा बदलाव आया कि 16 मई 1997 आने तक देश ने चार प्रधानमंत्री देख लिए थे।
एक साल में चार पीएम बदले
1996 में ग्यारहवीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए थे। चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी ने 16 मई को प्रधानमंत्री का पद संभाला। हालांकि 13 दिन ही प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाए थे और बहुमत साबित न कर पाने की वजह से इस्तीफा देना पड़ा था।
जनता दल के नेता एचडी देवेगौडा ने एक जून को संयुक्त मोर्चा गठबंधन सरकार का गठन किया था, लेकिन उनकी सरकार भी 10 महीने ही चली।
देवेगौड़ा के कार्यकाल में ही विदेश मंत्री रहे इन्द्र कुमार गुजराल ने अगले प्रधानमंत्री के रूप में 1997 में पदभार संभाला। उन्हें भी छह महीने बाद इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद लोकसभा भंग कर दी गई थी। गुजराल कार्यकारी प्रधानमंत्री बने रहे थे।
चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद मार्च 1998 में एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे।
इसलिए देवेगौड़ा को पद से हटना पड़ा था
1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने इसे देवेगौड़ा की किस्मत ही कहा जाना चाहिए कि वे मुख्यमंत्री पद से सीधे प्रधानमंत्री पद पर पहुंच गए थे। बात यह थी कि 31 मई 1996 को अटल वाजपेयी की सरकार के अल्पमत में होने के कारण उन्होंने प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था। उसी के अगले दिन एक जून 1996 को तत्काल में 24 दलों वाले संयुक्त मोर्चे का गठन कांग्रेस के समर्थन से किया गया और देवेगौड़ा को संयुक्त मोर्चे का नेता घोषित कर दिया गया और वे प्रधानमंत्री नियुक्त हो गए थे। लेकिन कांग्रेस की नीतियों के मनोनुकूल नहीं चल पाने के कारण देवगौड़ा को अप्रैल 1997 में अपने प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा था।
अटल विहारी बने थे तीन बार प्रधानमंत्री
अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के सबसे पॉपुलर नेताओं में से एक थे। वह भारत के तीन बार प्रधानमंत्री रहे। सबसे पहले वह साल 1996 में 13 दिन के लिए देश के पीएम रहे। दूसरी बार वह 1998 से 1999 तक पीएम रहे। ये सरकार केवल 13 महीने चली थी। तीसरी बार वह 1999 से 2004 तक पीएम रहे।
एक वोट से गिर गई थी वाजपेयी सरकार
ये वाकया 1999 का है, जब अटल सरकार केवल 13 महीने ही चल पाई और महज एक वोट से गिर गई थी। दरअसल, अटल 1998 में दूसरी बार पीएम बने थे। लेकिन राजनीतिक समीकरण कुछ ऐसे बने कि 17 अप्रैल 1999 को उन्हें लोकसभा में बहुमत साबित करना था। ये दिन अटल सरकार के लिए बहुत बुरा साबित हुआ और उनके समर्थन में 269 वोट पड़े, जबकि विपक्ष में 270 वोट पड़े। वाजपेयी सरकार विश्वास मत हार गई और गिर गई थी।
इस नेता की वजह से लगा वाजपेयी सरकार को झटका
अटल सरकार में पीएम के निजी सचिव रहे शक्ति सिन्हा की बुक ‘द इयर्स दैट चेंज्ड इंडिया’ में इस बात का जिक्र मिलता है। इसमें उन्होंने तमाम नेताओं का जिक्र किया है, जिसकी वजह से अटल सरकार गिरी थी। इसी में एक अहम नाम अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम पार्टी की जे जयललिता का भी आता है।
एआईएडीएमके की नेता जे जयललिता अटल सरकार की प्रमुख सहयोगी थीं, लेकिन बाद में उन्होंने गांधी परिवार से हाथ मिला लिया और अटल सरकार को गिराने की रणनीति बना ली। जयललिता ने तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन से मुलाकात के बाद वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लेने की चिट्ठी सौंपी। इसके बाद ही तत्कालीन पीएम वाजपेयी से कहा गया कि वह संसद में सरकार का बहुमत साबित करें।
अन्नाद्रमुक नेता जयललिता के समर्थन वापस लेने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार अल्पमत में गई थी और बाद में विश्वास मत हार गई थी। कहा जाता है कि वाजपेयी सरकार गिराने में उस एक वोट के पीछे तत्कालीन कांग्रेस सांसद गिरधर गमांग और नेशनल कॉन्फ्रेंस के सैफुद्दीन सोज जिम्मेदार थे। जिस दिन अटल सरकार गिरी थी, उसके दूसरे ही दिन फारुख अब्दुल्ला ने सोज को पार्टी से निकाल दिया था।
राजनीति के भद्र आदमी इंद्र कुमार गुजराल
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी गुजराल की भलमनसाहत जस की तस बनी रही। कॉलेज के दिनों से ही उन्होंने राजनीति में कदम रख दिया था। उन्होंने पहले कम्युनिस्ट पार्टी ज्वाइन की थी, लेकिन विभाजन के बाद गुजराल का पूरा परिवार भारत आ गया। भारत आने के बाद आईके गुजराल कांग्रेस में शामिल हो गए। अपने सिद्धांतों के आधार पर आगे बढ़ते रहे और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए। वे राज्यसभा से आने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री थे।
गुजराल की प्रशासनिक विशेषताओं को देखते हुए इंदिरा गांधी के कार्यकाल में उन्हें कई महत्वपूर्ण पदों पर तैनात किया गया था। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों के अलावा वे 1967-1976 के दौरान कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे, जो उनकी प्रशासनिक काबिलियत की मिसाल कही जा सकती है। 1975 में आपातकाल के दौरान गुजराल सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। बाद में रूस में भारतीय राजदूत के तौर पर भेज दिया गया था। गुजराल आपातकाल से खुश नहीं थे। संजय गांधी से हुई कहासुनी के बाद उन्होंने आखिरकार कांग्रेस छोड़ दी थी और जनता पार्टी का दामन पकड़ लिया था।

