केंद्र सरकार ने कहा है कि उसके पास इसकी कोई जानकारी नहीं है कि देश में नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के तहत कितने लोगों ने नागरिकता के लिए आवेदन किया है.
सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में कई सामाजिक कार्यकर्ताओं को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यही जानकारी दी है.
यही वजह है कि नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ मुखर रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं कि क्या किसी ने इस क़ानून के तहत नागरिकता के लिए आवेदन किया भी है?
उनका कहना है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में खुद स्वीकार किया है कि संशोधित नागरिकता क़ानून के मुताबिक़ कर्मचारियों की नियुक्ति समेत जो आधारभूत ढांचा तैयार करने की बात कही गई है, वह अब तक नहीं हो सका है.
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कुछ दिन पहले असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने अपने एक ट्वीट के जरिए दावा किया था कि बराक घाटी से एक व्यक्ति ने इस कानून के तहत नागरिकता के लिए आवेदन किया है. लेकिन उन्होंने उस व्यक्ति का परिचय सार्वजनिक नहीं किया था. बराक घाटी के पत्रकार भी आज तक उस व्यक्ति की तलाश नहीं कर सके हैं.
मौजूदा परिस्थिति में भाजपा के एक गुट का मानना है कि चुनाव से पहले नागरिकता क़ानून लागू करने के जरिए जिस राजनीतिक फायदे की उम्मीद की जा रही थी, वह शायद नहीं मिलेगा.
अब तक यह पता नहीं चल सका है कि पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से यहां आने वाले शरणार्थियों या मतुआ समुदाय के लोगों में से किसी ने सीएए के तहत नागरिकता के लिए आवेदन किया है या नहीं.
किसी ने आवेदन नहीं किया है, जानकारी कहां से दें?’
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पश्चिम बंगाल से शायद किसी ने नागरिकता हासिल करने के लिए आवेदन ही नहीं दिया है. ऐसे में केंद्र सरकार के पास इसकी जानकारी कहां से होगी?
मोहम्मद शाहीन ने जिस संगठन की ओर से आरटीआई के तहत याचिका दायर की थी उस बांग्ला पोखो के प्रमुख प्रोफेसर गर्ग चटर्जी ने बीबीसी बांग्ला से कहा, “यह कैसे संभव है कि केंद्र सरकार के पास इसकी कोई जानकारी नहीं हो कि ऑनलाइन कितने आवेदन जमा हुए हैं?”
“हमारी याचिका का मक़सद यह पता लगाना था कि अब तक कितने लोगों ने नागरिकता के लिए ऑनलाइन आवेदन किया है. इसी वजह से कई याचिकाएं दायर की गई थी. लेकिन इसका जवाब क्या मिला? यह कि हम इसका रिकॉर्ड नहीं रखते.”
उन्होंने कहा, “डिजिटल ऐप बनाने के बावजूद उनके पास रिकॉर्ड नहीं है. उन लोगों को यह भी नहीं पता कि आवेदन जमा हुए हैं या नहीं. हालांकि जवाब में यह नहीं कहा गया है कि हमें ऐसी सूचना मांगने या जानने का कोई अधिकार नहीं है.”
नहीं है’
सुकृति रंजन विश्वास कहते हैं, “हम शरणार्थी और मतुआ समुदाय को यही बात बार-बार समझा रहे हैं कि इस क़ानून के तहत नागरिकता हासिल करना संभव ही नहीं है. इसके तहत आवेदन करने के लिए जिन कागज़ात की ज़रूरत है, उनका इंतज़ाम करना किसी के लिए भी संभव नहीं है. इससे भी बड़ी बात यह है कि अगर आप नागरिकता के लिए आवेदन कर रहे हैं तो आप पहले ही मान लेते हैं कि आप भारतीय नागरिक नहीं हैं, बांग्लादेश से आकर यहां बसे हैं. लेकिन इनमें से लगभग सबके पास आधार कार्ड और वोटर कार्ड हैं. कई लोग सरकारी नौकरी भी कर रहे हैं.”
विश्वास का कहना था, “अगर नागरिकता के लिए आवेदन करने वाले लोगों ने खुद स्वीकार कर लिया कि वो भारतीय नागरिक नहीं हैं तो इसका मतलब यह होगा कि उनके पास जितनी तरह के पहचान पत्र और कार्ड हैं, वह सब रद्द हो जाएंगे. उसके बाद भी उनका आवेदन स्वीकार होगा और उनको भारतीय नागरिकता मिलेगी ही, इस बात की क्या गारंटी है?”क्या भाजपा का कोई फायदा होगा?
भाजपा में अब इस बात पर चिंता बढ़ रही है कि चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल और असम में संशोधित नागरिकता कानून लागू करने के जरिए वोटरों को अपने पाले में खींचने की जो रणनीति बनाई गई थी, उसे अब कहां तक हकीकत में बदला जा सकेगा.
पश्चिम बंगाल भाजपा के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बीबीसी बांगला से कहते हैं, “हमने सोचा था कि सीएए लागू होने पर हमें इसका चुनावी फायदा मिलेगा. लेकिन इसके तहत लोग आवेदन ही नहीं कर रहे हैं. ऐसे में हमें चुनाव में इसका फायदा कैसे मिलेगा? दरअसल, नागरिकता क़ानून के तहत आवेदन में जिन शर्तों को पूरा करने की बात कही गई है और जो प्रमाण मांगे गए हैं, वह ज़्यादातर लोगों के गले के नीचे नहीं उतर रही है.”
निजी बातचीत के दौरान ऐसी आशंका जताने के बावजूद भाजपा के तमाम नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक बार-बार अपने बंगाल दौरे में नागरिकता संशोधन कानून लागू करने का श्रेय ले रहे हैं. उनका दावा है कि इससे मतुआ और शरणार्थी लोगों को नागरिकता देने का रास्ता खुल गया है.
लेकिन इस सवाल का कहीं कोई जवाब नहीं मिल रहा है कि अगर सचमुच ऐसा है तो लोग इस क़ानून के तहत नागरिकता के लिए आवेदन क्यों नहीं कर रहे हैं?

