देशभर के सरकारी और निजी स्कूलों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अब हर स्कूल में छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। इस नियम का पालन नहीं करने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द की जा सकती है।
जस्टिस जेबी परदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने यह आदेश केंद्र सरकार की मेंस्ट्रुअल हाइजिन पॉलिसी को लेकर सुनाया। अदालत ने कहा कि कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं के लिए मासिक धर्म स्वच्छता से जुड़ी सुविधाएं पूरे देश में एक समान रूप से लागू की जानी चाहिए, चाहे स्कूल सरकारी हो या सरकारी सहायता प्राप्त।
कोर्ट ने यह भी अनिवार्य किया है कि स्कूल परिसरों में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय हों। इसके साथ ही सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया गया है कि हर स्कूल में दिव्यांग-अनुकूल (डिसेबल-फ्रेंडली) टॉयलेट बनाए जाएं, ताकि किसी भी छात्र को बुनियादी सुविधा से वंचित न रहना पड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय या सैनिटरी पैड जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। ऐसी स्थिति में छात्राएं शिक्षा और सह-पाठ्य गतिविधियों में लड़कों के समान भागीदारी नहीं कर पातीं।
- Advertisement -
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मासिक धर्म के दौरान गरिमापूर्ण और सुरक्षित सुविधा मिलना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का हिस्सा है। यदि स्कूल इस दिशा में लापरवाही बरतते हैं, तो यह छात्राओं की निजता और सम्मान दोनों को प्रभावित करता है।
यह फैसला शिक्षा व्यवस्था में लैंगिक समानता और छात्राओं के स्वास्थ्य अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

