वैश्विक अर्थव्यवस्था में धीरे लेकिन स्पष्ट बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। जहां एक ओर विकसित देश अब भी अमेरिकी डॉलर और सरकारी बॉन्ड को सुरक्षित निवेश मान रहे हैं, वहीं भारत समेत BRICS देशों ने डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में ठोस कदम बढ़ा दिए हैं। यह बदलाव केवल निवेश रणनीति का नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक शक्ति संतुलन के पुनर्गठन का संकेत देता है।
BRICS बनाम विकसित देश: निवेश की दो अलग राहें
अक्टूबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच जापान, जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड और डॉलर में निवेश बढ़ाया। इसके उलट भारत, चीन और ब्राजील जैसे उभरते BRICS देशों ने अमेरिकी बॉन्ड से दूरी बनानी शुरू की।
आंकड़ों के अनुसार, इन तीनों देशों ने बीते एक साल में अमेरिकी बॉन्ड में अपना निवेश करीब 183 अरब डॉलर घटा दिया है।
भारत ने क्यों घटाई अमेरिकी बॉन्ड में हिस्सेदारी
भारत के पास अक्टूबर 2025 में अमेरिकी बॉन्ड का मूल्य घटकर 190.7 अरब डॉलर रह गया, जबकि अक्टूबर 2024 में यह 241.4 अरब डॉलर था। यानी एक साल में करीब 40 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
यह तब हुआ है जब अमेरिकी बॉन्ड पर यील्ड करीब 4.8 प्रतिशत तक रही, जिसे आमतौर पर आकर्षक रिटर्न माना जाता है। इसके बावजूद भारत का निवेश घटाना यह दर्शाता है कि फैसला केवल मुनाफे पर नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति पर आधारित है।
डॉलर की वैश्विक पकड़ कमजोर
ग्लोबल फॉरेक्स रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी लगातार घट रही है। बीते पांच वर्षों में इसमें लगभग 18 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। भारत ने चार साल में पहली बार अमेरिकी ट्रेजरी में अपनी हिस्सेदारी कम की है, जो डीडॉलराइजेशन की दिशा में एक अहम संकेत माना जा रहा है।
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भारत की नई विदेशी मुद्रा रणनीति
भारत की नीति अब स्पष्ट है—विदेशी मुद्रा भंडार को केवल डॉलर तक सीमित न रखकर उसे अधिक संतुलित और विविध बनाना। इसी रणनीति के तहत भारत अपने भंडार में डॉलर के साथ-साथ सोना, यूरो और एशियाई बॉन्ड्स की हिस्सेदारी बढ़ा रहा है।
इसका उद्देश्य किसी एक मुद्रा या देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए आर्थिक स्थिरता और वित्तीय स्वतंत्रता को मजबूत करना है।
वैश्विक आर्थिक संतुलन में बदलाव
BRICS देशों की यह रणनीति केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक महत्व भी रखती है। डीडॉलराइजेशन की यह प्रक्रिया अमेरिका को तात्कालिक झटका भले न दे, लेकिन लंबी अवधि में डॉलर की वैश्विक प्रधानता को चुनौती जरूर देती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक वित्तीय व्यवस्था अधिक बहुध्रुवीय हो सकती है, जहां डॉलर के साथ अन्य मुद्राएं और संपत्तियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
कुल मिलाकर, भारत का अमेरिकी बॉन्ड और डॉलर से धीरे-धीरे दूरी बनाना यह दिखाता है कि वैश्विक आर्थिक खेल के नियम बदल रहे हैं, और उभरती अर्थव्यवस्थाएं अब अपने फैसले खुद तय करने के लिए तैयार हैं।

