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दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल भंडार वाले देश वेनेजुएला में अमेरिका की हालिया कार्रवाई के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजरें एक बार फिर इस लैटिन अमेरिकी देश पर टिक गई हैं। सवाल यह है कि राजनीतिक उथल-पुथल और सत्ता परिवर्तन जैसे घटनाक्रम क्या अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों और आपूर्ति को प्रभावित करेंगे या फिर वेनेजुएला की जमीनी हकीकत बाजार को फिलहाल स्थिर बनाए रखेगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वेनेजुएला को लेकर अमेरिका की दिलचस्पी सीधे तौर पर तेल से जुड़ी है। यह बयान उस घटनाक्रम के बाद सामने आया, जब अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को हिरासत में लेने की कार्रवाई की। इसके बाद अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के जरिए मादुरो शासन का अंत होने की बात कही गई, जिससे देश में 12 वर्षों से चला आ रहा सत्ता संतुलन टूट गया।
इन घटनाओं ने वैश्विक निवेशकों को सतर्क कर दिया है। जैसे ही वेनेजुएला का नाम आता है, कच्चे तेल की आपूर्ति, निर्यात और कीमतों को लेकर अटकलें तेज हो जाती हैं। वजह साफ है—वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित कच्चा तेल भंडार है।
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अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, वेनेजुएला के पास करीब 303 अरब बैरल कच्चा तेल है, जो वैश्विक तेल भंडार का लगभग पांचवां हिस्सा माना जाता है। कागजों पर यह आंकड़ा बेहद प्रभावशाली है, लेकिन वास्तविक उत्पादन इससे कहीं पीछे है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीकी कमियों, वर्षों से चले आ रहे गलत नीतिगत फैसलों और निवेश की भारी कमी के कारण वेनेजुएला अपने कुल तेल भंडार का महज एक प्रतिशत ही उत्पादन कर पा रहा है। यही वजह है कि मौजूदा हालात में वैश्विक तेल बाजार पर इसका तत्काल असर सीमित माना जा रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी संकेत दिए हैं कि अमेरिका वेनेजुएला की सरकारी व्यवस्था में भूमिका निभाएगा और बड़ी अमेरिकी तेल कंपनियां वहां निवेश कर सकती हैं। ट्रंप के अनुसार, अरबों डॉलर के निवेश से जर्जर हो चुकी तेल अवसंरचना को दोबारा खड़ा किया जाएगा। इस बयान के बाद ऊर्जा बाजार में मध्यम और दीर्घकालीन संभावनाओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
दरअसल, वेनेजुएला का तेल उद्योग पिछले एक दशक में बुरी तरह चरमरा चुका है। 2013 से 2020 के बीच देश का तेल उत्पादन 75 प्रतिशत से अधिक गिर गया। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, आर्थिक संकट और रखरखाव की कमी ने सरकारी तेल कंपनी पीडीवीसीए की हालत खराब कर दी। रिपोर्टों के अनुसार, कई पाइपलाइनें पिछले 50 वर्षों से अपग्रेड नहीं हुई हैं और उत्पादन को पुराने स्तर तक लाने के लिए लगभग 58 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी।
निर्यात के मोर्चे पर चीन वेनेजुएला का सबसे बड़ा खरीदार है, जबकि भारी क्रूड की जरूरत के कारण अमेरिका दूसरा बड़ा ग्राहक बना हुआ है। वेनेजुएला का तेल भारी श्रेणी का है, जिसे निकालने और रिफाइन करने के लिए उन्नत तकनीक चाहिए। अमेरिकी रिफाइनरियां इस तरह के तेल के लिए अनुकूल मानी जाती हैं, लेकिन प्रतिबंध और निवेश की कमी इस क्षमता को सीमित रखे हुए हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमेरिका के नेतृत्व में वेनेजुएला के तेल क्षेत्र का पुनर्गठन होता है, तो लंबी अवधि में यह वैश्विक आपूर्ति का अहम हिस्सा बन सकता है। हालांकि, उत्पादन को पूरी तरह पटरी पर आने में 5 से 10 साल तक का समय लग सकता है।
फिलहाल तेल बाजार पहले से ही ओपेक की बढ़ती आपूर्ति और कमजोर वैश्विक मांग की आशंकाओं से जूझ रहा है। ऐसे में विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि वेनेजुएला की मौजूदा राजनीतिक उथल-पुथल से बाजार को तुरंत कोई बड़ा झटका लगने की संभावना कम है, लेकिन आने वाले वर्षों में यह देश ऊर्जा संतुलन को जरूर प्रभावित कर सकता है।

