सोमनाथ मंदिर के पहले विध्वंस को एक हजार वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक विस्तृत ब्लॉग पोस्ट साझा किया। इस लेख में उन्होंने न केवल सोमनाथ मंदिर के गौरवशाली अतीत और उसके पुनर्निर्माण की यात्रा को याद किया, बल्कि आज़ादी के बाद मंदिर से जुड़े राजनीतिक और वैचारिक मतभेदों का भी उल्लेख किया।
प्रधानमंत्री ने अपने ब्लॉग में लिखा कि ‘सोमनाथ’ नाम मात्र से ही भारतीय जनमानस में आस्था, आत्मविश्वास और सांस्कृतिक गौरव की भावना जाग उठती है। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित यह मंदिर भारत की सभ्यतागत निरंतरता का प्रतीक रहा है। वर्ष 1026 ईस्वी में मंदिर का पहला विध्वंस हुआ था, जिसके बाद कई बार इसे नष्ट किया गया और फिर पुनः खड़ा किया गया।
पीएम मोदी ने यह भी रेखांकित किया कि वर्तमान स्वरूप में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण वर्ष 1951 में पूर्ण हुआ। संयोग से वर्ष 2026 न केवल विध्वंस के 1000 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है, बल्कि मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष भी इसी वर्ष पूरे हो रहे हैं।
अपने ब्लॉग में प्रधानमंत्री ने सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका को विशेष रूप से याद किया। उन्होंने बताया कि आज़ादी के तुरंत बाद, 1947 में दीवाली के समय सरदार पटेल की सोमनाथ यात्रा ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। उसी दौरान उन्होंने मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया और इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ा।
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प्रधानमंत्री ने पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का भी उल्लेख किया। उन्होंने लिखा कि 11 मई 1951 को मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद जब इसके द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोले गए, तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति ने इस आयोजन को ऐतिहासिक बना दिया।
ब्लॉग के एक हिस्से में पीएम मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का संदर्भ देते हुए कहा कि वे इस आयोजन को लेकर उत्साहित नहीं थे। उनके अनुसार, नेहरू नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति या मंत्री इस समारोह में शामिल हों, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि प्रभावित हो सकती है। हालांकि, डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने निर्णय पर अडिग रहे और यह आयोजन संपन्न हुआ, जिसने इतिहास में एक नई इबारत लिखी।
प्रधानमंत्री ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में के.एम. मुंशी के योगदान को भी अहम बताया। उन्होंने लिखा कि मुंशी ने न केवल सरदार पटेल का मजबूती से समर्थन किया, बल्कि अपने लेखन और विचारों के माध्यम से इस आंदोलन को वैचारिक आधार भी दिया। उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ: द श्राइन इटरनल’ का उल्लेख करते हुए पीएम ने इसे अवश्य पढ़े जाने योग्य बताया।
पीएम मोदी का यह ब्लॉग सोमनाथ मंदिर को केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, संघर्ष और पुनरुत्थान के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करता है, साथ ही आज़ादी के बाद के ऐतिहासिक निर्णयों पर नई बहस को भी जन्म देता है।

