इंदौर। देश के सबसे साफ शहर का तमगा पाने वाले इंदौर में गंदे पानी की आपूर्ति से हुई मौतों ने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से सैकड़ों लोगों के बीमार होने और 8 से 10 लोगों की मौत की खबरों के बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पानी की वजह से लोगों की जान जाना किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।
एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने प्रशासन को तत्काल प्रभावित क्षेत्रों में पानी के टैंकरों की व्यवस्था करने के निर्देश दिए। अदालत ने टिप्पणी की कि इंदौर की साफ-सुथरी छवि को इस तरह की लापरवाही से धूमिल नहीं होने दिया जाना चाहिए।
‘सबसे साफ शहर’ पर गंदे पानी का दाग
इंदौर, जिसे सात बार देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जा चुका है, अब ‘मल युक्त पानी’ पीने से मौतों के आरोपों से घिर गया है। यह सब उस समय हुआ, जब शहर में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी अमृत योजना लागू है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद गंदे पानी की सप्लाई को गंभीरता से नहीं लिया गया।
पानी में बढ़ता जहर, आंकड़े कर रहे हैं चेतावनी
हाई कोर्ट की टिप्पणी के साथ ही देश में पानी की गुणवत्ता को लेकर पुरानी लेकिन गंभीर सच्चाई भी सामने आई है। जल शक्ति मंत्रालय और ग्राउंड वॉटर क्वालिटी रिपोर्ट के अनुसार, देश के करीब 20 प्रतिशत भूजल नमूनों में हानिकारक तत्व तय सीमा से अधिक पाए गए हैं।
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मध्य प्रदेश की स्थिति और भी चिंताजनक है। राज्य के 22.58 प्रतिशत सैंपलों में नाइट्रेट की मात्रा मानक से ज्यादा पाई गई, जबकि 40 जिलों में फ्लोराइड और कई इलाकों में यूरेनियम की मात्रा भी खतरनाक स्तर पर दर्ज की गई। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या अब मौसमी नहीं रही, बल्कि स्थायी और मानव-निर्मित बन चुकी है।
शिकायतें होती रहीं, प्रशासन सोता रहा
भागीरथपुरा में दूषित पानी की समस्या अचानक सामने नहीं आई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पहली शिकायत 15 अक्टूबर को इंदौर मेयर हेल्पलाइन पर दर्ज कराई गई थी। इसके बाद नवंबर और दिसंबर में भी पानी में बदबू और गंदगी की शिकायतें की गईं। 18 दिसंबर को हालात और बिगड़ गए और 90 प्रतिशत आबादी के बीमार पड़ने की बात सामने आई। इसके बावजूद प्रशासन ने तब तक ठोस कदम नहीं उठाए, जब तक मौतों की खबरें सामने नहीं आ गईं।
पाइपलाइन के ऊपर बना शौचालय बना कारण
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जिस पाइपलाइन से नर्मदा का पानी सप्लाई होता है, उसके ऊपर बिना सेप्टिक टैंक के शौचालय बना हुआ था। इसी कारण गंदगी पाइपलाइन में मिल गई और पूरे इलाके में दूषित पानी पहुंचा। 26 दिसंबर से अब तक 1400 से ज्यादा लोग बीमार हो चुके हैं। प्रशासन आधिकारिक तौर पर चार मौतें स्वीकार कर रहा है, जबकि गैर-सरकारी आंकड़ों में यह संख्या 8 से 10 बताई जा रही है।
सरकारी संवेदनहीनता पर सवाल
इस पूरे मामले में सरकार की गंभीरता पर भी सवाल उठे हैं। एक मंत्री की विवादित प्रतिक्रिया ने लोगों की नाराजगी और बढ़ा दी। आलोचकों का कहना है कि अगर समय रहते शिकायतों पर ध्यान दिया गया होता, तो हालात इतने भयावह नहीं होते।

