पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीदों को झटका देते हुए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई लंबी कूटनीतिक वार्ता बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो गई। करीब 21 घंटे तक चली इस उच्चस्तरीय बैठक के बाद दोनों देशों के बीच मतभेद जस के तस बने हुए हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका और गहरा गई है।
वार्ता क्यों रही बेनतीजा?
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ किया कि बातचीत के दौरान अमेरिका ने ईरान के सामने अपना “अंतिम और सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव” रखा था, लेकिन ईरानी पक्ष ने उसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने यह भी कहा कि कई दौर की चर्चा के बावजूद दोनों देश किसी साझा बिंदु तक नहीं पहुंच सके।
वेंस ने पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुए प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख असीम मुनीर को सफल मेजबान बताया, लेकिन साथ ही यह भी माना कि मध्यस्थता के बावजूद बातचीत को सफलता नहीं मिल सकी।
ईरान का कड़ा रुख
ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ ने अमेरिका पर भरोसा न जीत पाने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि ईरान ने वार्ता में रचनात्मक प्रस्ताव रखे, लेकिन अमेरिकी पक्ष ईरानी प्रतिनिधिमंडल का विश्वास हासिल करने में असफल रहा।
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ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने भी पुष्टि की कि बातचीत के दौरान कई मुद्दों पर चर्चा जरूर हुई, लेकिन किसी भी बिंदु पर अंतिम सहमति नहीं बन पाई।
बंद कमरे में किन मुद्दों पर टकराव?
सूत्रों के मुताबिक, इस बातचीत का मुख्य फोकस ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय गतिविधियों और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर था। अमेरिका इन मुद्दों पर सख्त शर्तें चाहता था, जबकि ईरान ने किसी भी तरह के दबाव में झुकने से इनकार कर दिया।
दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ी बाधा विश्वास की कमी रही, जिसने समझौते की संभावनाओं को कमजोर कर दिया।
पाकिस्तान की भूमिका भी रही अहम
इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान ने मध्यस्थ के तौर पर अहम भूमिका निभाई। इस्लामाबाद में हुई यह वार्ता हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक कोशिशों में गिनी जा रही थी। इसे ‘मेक या ब्रेक’ बातचीत माना जा रहा था, लेकिन अंततः कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया।
आगे क्या?
विशेषज्ञों का मानना है कि इस वार्ता की विफलता के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ सकता है। पहले से ही जटिल हालात के बीच यह घटनाक्रम क्षेत्र को एक बार फिर अनिश्चितता की ओर धकेल सकता है। आने वाले समय में कूटनीतिक प्रयास जारी रहेंगे या नहीं, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

