बीकानेर। राजस्थान की पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक माने जाने वाले खेजड़ी वृक्ष को बचाने के लिए बीकानेर में चला आंदोलन अंततः संवाद और सहमति के साथ समाप्त हो गया। संत समाज की अगुवाई, समाज की एकजुटता और प्रशासन की सक्रिय भूमिका के चलते यह आंदोलन शांतिपूर्ण समाधान तक पहुंचा। इसे पर्यावरण संरक्षण और लोकतांत्रिक संवाद की मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
1730 की विरासत से मिली प्रेरणा
आंदोलन की पृष्ठभूमि 1730 के खेजड़ली बलिदान से जुड़ी रही, जब अमृता देवी बिश्नोई सहित 363 लोगों ने खेजड़ी वृक्षों की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए थे। “सर साटे रूख रहे तो भी सस्तो जाण” की भावना को आंदोलन का नैतिक आधार बनाया गया। धरनास्थल पर शहीदों के चित्रों के माध्यम से समाज ने अपनी ऐतिहासिक प्रतिबद्धता दोहराई।
सोलर परियोजनाओं से बढ़ा विवाद
बीकानेर क्षेत्र में सोलर परियोजनाओं और विकास कार्यों के चलते खेजड़ी कटाई को लेकर असंतोष गहराया। समाज का आरोप था कि 1983 से लागू संरक्षण कानून के बावजूद अंधाधुंध कटाई हो रही है। मांगों में अवैध कटाई पर रोक, दोषियों पर कार्रवाई, अनिवार्य पुनर्वनीकरण और सोलर परियोजनाओं में पर्यावरणीय शर्तें शामिल थीं।
363 आमरण अनशन ने बदली दिशा
आंदोलन ने निर्णायक रूप तब लिया जब 363 लोगों ने आमरण अनशन की घोषणा की। यह संख्या ऐतिहासिक बलिदान का प्रतीक थी। धरनास्थल पर सैकड़ों लोग मौजूद रहे, लेकिन संत समाज ने लगातार शांति और संयम की अपील की। पूरा आंदोलन अनुशासित और शांतिपूर्ण रहा।
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प्रशासन ने संभाली कमान
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन सक्रिय हुआ। कलेक्टर और पुलिस अधिकारियों ने धरनास्थल पर पहुंचकर संवाद का रास्ता खोला। प्रशासनिक टीम ने आंदोलनकारियों को आश्वस्त किया कि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।
बीच-बीच में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी सामने आईं। कुछ अनशनकारियों की तबीयत बिगड़ने पर अस्थायी चिकित्सा शिविर की व्यवस्था की गई। इससे संभावित संकट टल गया।
लिखित आश्वासन और संशोधित मसौदा
राज्य सरकार के प्रतिनिधियों ने संत समाज को लिखित आश्वासन सौंपा। प्रारंभिक मसौदे पर कुछ आपत्तियां उठीं, जिसके बाद संवाद के माध्यम से संशोधित पत्र तैयार किया गया। इसमें मांगों को अधिक स्पष्ट और व्यापक रूप में शामिल किया गया।
अंततः एकादशी के दिन संत समाज की उपस्थिति में सर्वसम्मति से अनशन समाप्त हुआ। वातावरण भावुक था और इसे समाज की एकजुटता की जीत बताया गया।
आगे की राह और अनुत्तरित सवाल
हालांकि आंदोलन समाप्त हो गया, लेकिन कुछ अहम प्रश्न अब भी चर्चा में हैं—
क्या संरक्षण कानून का कड़ाई से पालन होगा?
क्या विकास और पर्यावरण में संतुलन के लिए स्पष्ट नीति बनेगी?
क्या सोलर परियोजनाओं के साथ अनिवार्य वृक्षारोपण को कानूनी रूप दिया जाएगा?
राज्य स्तर पर सोलर परियोजनाओं के साथ बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण को अनिवार्य करने का प्रस्ताव विचाराधीन बताया जा रहा है। यदि इसे लागू किया जाता है तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।
संवाद की जीत
बीकानेर का यह घटनाक्रम दर्शाता है कि जब समाज संयम रखे, संत मार्गदर्शन दें और प्रशासन संवेदनशीलता दिखाए, तो जटिल विवाद भी शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाए जा सकते हैं।
खेजड़ी केवल एक वृक्ष नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक अस्मिता और पर्यावरणीय संतुलन का प्रतीक है। तीन सदियों पुरानी विरासत से प्रेरित यह आंदोलन साबित करता है कि समाज आज भी अपनी हरियाली की रक्षा के लिए सजग है।

