स्कूल बंद, फिर भी कागजों में सप्लाई
एसीबी के अनुसार, कोविड काल में जब राज्य के अधिकांश स्कूल बंद थे, उस दौरान मिड डे मील योजना के तहत विद्यार्थियों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने के नाम पर दाल, तेल और मसालों के कॉम्बो पैक की आपूर्ति दर्शाई गई। यह जिम्मेदारी कॉनफैड को सौंपी गई थी। कागजों में दावा किया गया कि सामग्री एफएसएसएआई और एगमार्क मानकों के अनुरूप थी और स्कूलों तक सीधे आपूर्ति की गई, लेकिन जांच में इन दावों की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
नियमों में मनमानी, चहेती फर्मों को फायदा
जांच में यह भी उजागर हुआ कि मिड डे मील योजना से जुड़े अधिकारियों और कॉनफैड के जिम्मेदारों ने आपसी सांठगांठ से टेंडर नियमों में अपने अनुसार बदलाव किए। योग्य और पात्र कंपनियों को प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया, जबकि कुछ चुनिंदा फर्मों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। इन फर्मों ने आगे काम को बिना अनुमति अन्य एजेंसियों को सबलेट कर दिया, जिससे फर्जी सप्लायर और ट्रांसपोर्टरों का एक नेटवर्क तैयार हो गया।
बिना सप्लाई के बनाए गए फर्जी बिल
एसीबी की जांच में सामने आया कि कई मामलों में न तो वास्तविक रूप से माल खरीदा गया और न ही उसकी आपूर्ति हुई, फिर भी अधिक दरों पर बिल बनाए गए। इन्हीं फर्जी बिलों के आधार पर सरकारी भुगतान उठाया गया। इस सुनियोजित प्रक्रिया के जरिए कूटरचना, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया, जिससे राज्य सरकार को करीब 2000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
21 आरोपियों पर दर्ज हुआ मामला
इस घोटाले में कॉनफैड के सहायक लेखाधिकारी, प्रबंधक, सहायक प्रबंधक, गोदाम प्रभारी और सुपरवाइजर सहित कई अधिकारी आरोपी बनाए गए हैं। इसके अलावा केंद्रीय भंडार के क्षेत्रीय और डिप्टी मैनेजर तथा तिरूपति सप्लायर्स, जागृत एंटरप्राइजेज, एमटी एंटरप्राइजेज और साई ट्रेडिंग जैसी निजी फर्मों के मालिक भी इस मामले में नामजद हैं।
एसीबी ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच अभी जारी है। आरोपियों की भूमिका, वित्तीय लेन-देन, दस्तावेजों की हेराफेरी और सरकारी धन के दुरुपयोग से जुड़े हर पहलू की गहन पड़ताल की जा रही है। यह घोटाला न सिर्फ सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि आपदा के समय किए गए भ्रष्टाचार की गंभीर तस्वीर भी सामने लाता है।