नई दिल्ली/काठमांडू। हाल के वैश्विक घटनाक्रमों की चर्चा के बीच इतिहास के पन्नों में दर्ज एक महत्वपूर्ण प्रसंग फिर चर्चा में है। करीब 76 साल पहले भारत ने पड़ोसी देश नेपाल में ऐसा कूटनीतिक कदम उठाया था, जिसने वहां की सत्ता व्यवस्था की दिशा ही बदल दी। यह मामला 1950–51 का है, जब भारत ने नेपाल के राजा त्रिभुवन शाह को अपने काठमांडू स्थित दूतावास में शरण दी और बाद में उन्हें सुरक्षित रूप से दिल्ली लाया गया। इस कदम ने नेपाल में लंबे समय से चले आ रहे राणा शासन के अंत की नींव रखी।
नेपाल में राणा शासन की पृष्ठभूमि
नेपाल में 19वीं सदी के मध्य से राणा परिवार का वर्चस्व था। 1846 में जंग बहादुर राणा ने ‘कोत पर्व’ के बाद सत्ता पर कब्जा किया और शाह वंश को केवल नाममात्र का राजा बना दिया। वास्तविक प्रशासन, सेना और विदेश नीति राणा प्रधानमंत्रियों के हाथ में थी। राजा त्रिभुवन शाह, जिन्हें 1911 में मात्र पांच वर्ष की उम्र में गद्दी पर बैठाया गया, व्यावहारिक रूप से शक्तिहीन थे।
इतिहासकारों के अनुसार, राणा शासन को ब्रिटिश साम्राज्य का अप्रत्यक्ष समर्थन भी मिला हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गोरखा सैनिकों को मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़ने के लिए भेजे जाने से यह संबंध और मजबूत हुआ।
आजाद भारत और नेहरू की दुविधा
1947 में भारत की आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने यह सवाल था कि नेपाल में किस राजनीतिक धारा का समर्थन किया जाए। एक ओर राणा शासन था, तो दूसरी ओर नेपाल की जनता और ‘प्रजा परिषद’ जैसे संगठन लोकतांत्रिक बदलाव की मांग कर रहे थे। 1950 में नेपाल के राणा प्रधानमंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा भारत आए और नेहरू से मुलाकात की, लेकिन नेपाल की आंतरिक स्थिति लगातार अस्थिर होती जा रही थी।
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राजा त्रिभुवन का भारतीय दूतावास में शरण लेना
6 नवंबर 1950 को राजा त्रिभुवन अपने परिवार के साथ शिकार का बहाना बनाकर काठमांडू से निकले और सीधे भारतीय दूतावास पहुंच गए। उनके साथ युवराज महेंद्र और बड़े पोते वीरेंद्र थे। छोटे पोते ज्ञानेंद्र उस समय नेपाल में ही रह गए।
इस घटनाक्रम से नाराज राणा प्रधानमंत्री मोहन शमशेर ने 9 नवंबर 1950 को तीन वर्षीय ज्ञानेंद्र को नेपाल का राजा घोषित कर दिया।
भारत का निर्णायक कदम
भारत सरकार ने 10 नवंबर 1950 को बड़ा फैसला लेते हुए दो विमानों के जरिए राजा त्रिभुवन और उनके परिवार को काठमांडू से नई दिल्ली एयरलिफ्ट कर लिया। प्रधानमंत्री नेहरू ने उनका औपचारिक स्वागत किया और ज्ञानेंद्र को वैध राजा मानने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही भारत ने राणा शासन पर कूटनीतिक दबाव बढ़ा दिया।
जनआंदोलन और दिल्ली समझौता
राजा के भारत पहुंचते ही नेपाल में व्यापक जनआंदोलन शुरू हो गया। युवाओं और महिलाओं ने सड़कों पर उतरकर राणा शासन के खिलाफ प्रदर्शन किए। नेपाली कांग्रेस की मुक्ति सेना और राणा सेना के बीच कई स्थानों पर संघर्ष भी हुआ।
आखिरकार फरवरी 1951 में ‘दिल्ली समझौता’ हुआ। इसके तहत राणा शासन का अंत हुआ और संवैधानिक राजतंत्र की राह खुली। 15 फरवरी 1951 को राजा त्रिभुवन परिवार सहित काठमांडू लौटे। उनके स्वागत में राजधानी की सड़कों पर भारी जनसमूह उमड़ा।
संवैधानिक राजतंत्र की शुरुआत
18 फरवरी 1951 को नारायणहिटी दरबार में राजा त्रिभुवन की औपचारिक ताजपोशी हुई। उन्होंने नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र की घोषणा की, जिससे देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुरुआत मानी जाती है।

