बीकानेर। जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग ने 09 से 11 जनवरी 2026 तक बीकानेर में कैमल फेस्टिवल का आयोजन बड़े धूमधाम से किया। हेरिटेज टूर से इसकी शुरुआत हुई, रायसर के धोरों में रंगीन सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ हुईं और करणी सिंह स्टेडियम में ऊँट-केंद्रित गतिविधियों की भरमार रही – ऊँट दौड़, लोकनृत्य, ऊँट सजावट, फर-कटिंग प्रतियोगिता और ऊँट करतब। मंच सजे, कैमरे चमके और ‘हाई सोसाइटी’ की मौजूदगी ने पूरे आयोजन को ग्लैमर से भर दिया।
पहली नजर में यह आयोजन भव्य और सफल प्रतीत हुआ, लेकिन वास्तविक केंद्र ऊँट और उनके पालक पूरी तरह नजरअंदाज किए गए। राजस्थान की पहचान और मरुस्थल की जीवनरेखा का प्रतीक ऊँट, आज गिरती आबादी, संरक्षण की कमी, चरागाह संकट और पालन-पोषण की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
ऊँट-पालक समुदाय, जिनकी पीढ़ियाँ इस पशु के साथ जीवन जीती रही हैं, आज घटते चरागाह, गिरती मांग और सामाजिक-आर्थिक बदलाव के कारण गंभीर संकट में हैं। बावजूद इसके इस फेस्टिवल में उनके स्वास्थ्य, बीमा, न्यूनतम पारिश्रमिक या वास्तविक समस्याओं पर कोई मंच नहीं रखा गया।
कैमल फेस्टिवल का उद्देश्य केवल पर्यटन और मनोरंजन नहीं, बल्कि ऊँट और ऊँट-पालकों की आजीविका और पहचान सशक्त करना होना चाहिए। राजस्थान में देश के 85 प्रतिशत से अधिक ऊँट पाए जाते हैं और बीकानेर, चूरू, जैसलमेर क्षेत्र परंपरागत रूप से ऊँट प्रजनन और पालन का प्रमुख इलाका हैं। लेकिन पशुपालन जनगणना के अनुसार 2012 में लगभग 3.25 लाख ऊँट थे, जो 2019 में घटकर 2.13 लाख रह गए। यानी केवल सात वर्षों में लगभग 35 प्रतिशत गिरावट।
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इस आयोजन में राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान केंद्र और राजस्थान पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं की भूमिका नगण्य रही। ऊँटों की घटती आबादी, नस्ल सुधार, रोग प्रबंधन और चरागाह संकट पर कोई वैज्ञानिक चर्चा नहीं हुई, न ही ऊँट-पालकों के लिए प्रशिक्षण या परामर्श उपलब्ध कराया गया।
इस प्रकार यह आयोजन मनोरंजन और पर्यटन प्रचार तक सीमित रह गया, जबकि असली मुद्दा – ऊँट और उनका पालन-पोषण – पूरी तरह उपेक्षित रह गया। यदि इस तरह के उत्सव केवल प्रदर्शन और आत्मप्रचार का माध्यम बन जाएंगे, तो राजस्थान की यह मरुस्थलीय जीवनरेखा धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बनती जाएगी।

