रेगिस्तानी क्षेत्र और सीमित वर्षा के बावजूद बीकानेर संभाग के किसान अब नई तकनीकों के सहारे मशरूम की खेती से अच्छी आमदनी कमा रहे हैं। बढ़ती खेती लागत और कम पानी की उपलब्धता के बीच मशरूम उत्पादन किसानों के लिए एक लाभदायक विकल्प बनता जा रहा है। नियंत्रित तापमान और नमी वाले वातावरण में उगाई जाने वाली यह फसल कम जगह और कम समय में बेहतर मुनाफा देती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यहां 16 से 24 डिग्री से लेकर 30–35 डिग्री तक नियंत्रित तापमान में मशरूम की प्रमुख चार किस्मों का उत्पादन संभव है। बटन मशरूम की बुवाई अक्टूबर से फरवरी के बीच होती है और इसके फलन के लिए 15–18 डिग्री तापमान उपयुक्त रहता है। वहीं ऑयस्टर मशरूम मार्च से जून तक 25–30 डिग्री तापमान में तैयार होता है। इसके अलावा मिल्की या दुधिया मशरूम जुलाई से सितंबर के दौरान 30–35 डिग्री तापमान और 80–90 प्रतिशत आर्द्रता में अच्छी पैदावार देता है।
मशरूम उत्पादन की खास बात यह है कि इसके लिए खेत की जरूरत नहीं होती। घर का खाली कमरा, कच्ची झोपड़ी या छप्पर भी पर्याप्त होता है। लगभग 20×20 फीट की जगह में भी इसकी शुरुआत की जा सकती है। करीब 35 से 40 हजार रुपये की शुरुआती लागत में एक छोटी उत्पादन इकाई तैयार की जा सकती है।
तापमान और नमी को नियंत्रित रखने के लिए फॉगर्स, एग्जॉस्ट फैन, शेड नेट और थर्मो-हाइग्रोमीटर जैसे उपकरणों का उपयोग किया जाता है। सीमित संसाधनों वाले किसान, भूमिहीन परिवार और महिला स्वयं सहायता समूह भी इस खेती को अपनाकर सालभर आय का साधन बना रहे हैं। यही कारण है कि रेगिस्तानी इलाके में भी मशरूम खेती अब किसानों के लिए “सफेद सोना” साबित हो रही है।

