बीकानेर के परकोटे में पुष्करणा समाज के सावे पर पारंपरिक वैवाहिक उत्सव की रंगत देखते ही बनी। सिर पर केसरिया खिड़किया पाग, ललाट पर पेवड़ी, बनियान और पीतांबर धारण किए, हाथों में चांदी की छड़ी व गेड़िया लिए विष्णु स्वरूप दूल्हे जब विवाह के लिए निकले तो पूरा शहर केसरिया लाड़ो जीवंतो रे जैसे मंगल गीतों से गूंज उठा। परकोटे की गलियों और चौक-चौराहों पर खड़े लोगों ने पुष्प वर्षा कर बारातों का स्वागत किया।
शंखनाद, झालर की मधुर ध्वनि और पारंपरिक लोकगीतों ने माहौल को भक्तिमय और उत्सवमय बना दिया। शुभ मुहूर्त शुरू होते ही हर मोहल्ले से बारातें निकलनी शुरू हुईं, जो देर रात तक चलती रहीं। घोड़ी, रथ, बैंड और डीजे के साथ सजी-धजी बारातों ने पूरे क्षेत्र को जीवंत कर दिया। अनुमान है कि परकोटे में करीब 160 विवाह समारोह आयोजित हुए।
सुबह बन्ना-बन्नी के ननिहाल से मायरा आया, वहीं दोपहर में खिरोड़ा की रस्म निभाई गई। इस दौरान गोत्राचार पढ़े गए और कच्चे दूध से बिंद के पैर धोकर कन्यादान की परंपरा पूरी की गई। बड़ पापड़ बांचने की रस्म में हंसी-मजाक और रिश्तों की सराहना का अनूठा रंग देखने को मिला।
खिरोड़ा के बाद सजे-धजे दूल्हे जब बारात के साथ निकले तो पीछे चलते लोग केसरिया लाड़ो जीवंतो रे गाते रहे। ससुराल पहुंचने पर महिलाओं ने हर आयो हर आयो काशी रो वासी आयो गीत गाकर दूल्हे का स्वागत किया, जिससे पूरा वातावरण उल्लास और परंपरा के रंग में रंग गया।

