राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर मुंबई में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में वीर विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग एक बार फिर चर्चा में आ गई। रविवार को आयोजित ‘संघ यात्रा के 100 साल: नए क्षितिज’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने इस विषय पर अपनी स्पष्ट राय रखी।
भारत रत्न से पुरस्कार की प्रतिष्ठा बढ़ेगी: भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि यदि वीर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है, तो इससे सावरकर को नहीं बल्कि स्वयं इस सम्मान की गरिमा को मजबूती मिलेगी। उन्होंने कहा कि सावरकर किसी पुरस्कार के मोहताज नहीं हैं, क्योंकि वे पहले ही देशवासियों के हृदय में अपना स्थान बना चुके हैं।
भागवत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह उस निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं, जो भारत रत्न देने से जुड़ी है। हालांकि, उन्होंने कहा कि यदि संबंधित लोगों से संवाद का अवसर मिलेगा तो वे यह जरूर जानने का प्रयास करेंगे कि इस फैसले में अब तक देरी क्यों हो रही है।
सम्मान के बिना भी जनमानस में स्थापित हैं सावरकर
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि बिना किसी औपचारिक सम्मान के भी सावरकर जनता के बीच आदर और सम्मान का स्थान रखते हैं। उन्होंने सावरकर के योगदान को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक चिंतन के लिए महत्वपूर्ण बताया।
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राजनीतिक बहस का पुराना मुद्दा
वीर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की मांग लंबे समय से राजनीतिक विवाद का विषय रही है। भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना जैसे दल लगातार इस मांग के समर्थन में खड़े रहे हैं। उनका कहना है कि सावरकर एक महान स्वतंत्रता सेनानी, विचारक, लेखक और समाज सुधारक थे।
वहीं, कांग्रेस पार्टी इस मांग का विरोध करती रही है। कांग्रेस का तर्क है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ब्रिटिश सरकार को भेजी गई दया याचिकाओं के कारण सावरकर का योगदान विवादित रहा है।
संघ की विचारधारा और कार्यशैली पर भी बोले भागवत
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने संघ की कार्यप्रणाली पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आरएसएस का उद्देश्य आक्रामक प्रचार करना नहीं, बल्कि समाज में संस्कारों का निर्माण करना है। उन्होंने चेतावनी दी कि अत्यधिक प्रचार से दिखावा और अहंकार बढ़ता है, जिससे बचना जरूरी है।
भाषा पर स्पष्ट रुख
भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि संघ की कार्यप्रणाली में अंग्रेजी को माध्यम भाषा नहीं बनाया जाएगा, क्योंकि यह भारतीय भाषा नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जहां आवश्यकता होगी, वहां अंग्रेजी का प्रयोग किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है ताकि वैश्विक स्तर पर संवाद किया जा सके, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि मातृभाषा की उपेक्षा की जाए। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि दक्षिण भारत में संवाद के दौरान आवश्यकता पड़ने पर अंग्रेजी का उपयोग किया गया, ताकि बातचीत प्रभावी बनी रहे।

