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देश-दुनिया

महाराष्ट्र की मस्जिदों में गणपति बप्पा की पूजा: जानिए क्यों?

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editor Published September 17, 2024
Last updated: 2024/09/17 at 12:56 PM
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कोल्हापुर और सांगली के गाँवों में 40 साल से जारी है हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल

Contents
कैसे शुरू हुई यह परंपरा?परंपरा फिर कब शुरू हुईमुहर्रम और गणेश उत्सवविभाजन का बीज बोने के प्रयास नाकामकुरुन्दवाड़ की पांच मस्जिदेंभाईचारे की विरासत

गणेश उत्सव के दौरान यहां के गाँवों की मस्जिदों में गणपति की प्रतिमा स्थापित की जाती है.

सांगली ज़िले के वालवा तहसील का गोटखिंडी एक ऐसा ही गांव है, जो इस परंपरा को निभाता चला आ रहा है.

यहां युवाओं के एक समूह ‘न्यू गणेश मंडल’ ने झुझार चौक स्थित मस्जिद में गणपति की प्रतिमा स्थापित की है. इस साल मस्जिद में गणेश प्रतिमा की स्थापना का 44वां वर्ष है.

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उत्सव के 10 दिनों के दौरान यहां के लोग हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को मजबूत करते हुए गणपति की पूजा करते हैं.

कैसे शुरू हुई यह परंपरा?

इस परंपरा की शुरुआत साल 1961 में हुई थी, जब गोटखिंडी के कुछ युवाओं ने गाँव के चौराहे पर गणेश प्रतिमा स्थापित करने का फ़ैसला किया.

उस समय यह बहुत छोटे पैमाने पर किया गया. गणेश प्रतिमा को खुले आसमान के नीचे रखा गया था.

एक रात बारिश की वजह से गणेश प्रतिमा भीग रही थी, एक मुस्लिम व्यक्ति ने जब यह देखा तो उसने गणेश मंडल के लोगों को सूचना दी.

मुस्लिम व्यक्ति निज़ाम पठान, उनके रिश्तेदारों और गांव वालों ने गणेश प्रतिमा को बारिश से बचाने के लिए पास की मस्जिद में रखने का सुझाव दिया.

इस सुझाव से सभी सहमत थे और पहली बार किसी मस्जिद में भगवान गणेश को स्थापित किया गया.

इसके बाद गणेश उत्सव के बाकी दिनों में गणेश पूजा मस्जिद के भीतर ही हुई. यह उस साल का यादगार और दुर्लभ महोत्सव रहा.

हालांकि, यह प्रथा साल 1986 तक नहीं दोहराई गई.

परंपरा फिर कब शुरू हुई

गोटखिंडी गांव के रहने वाले अशोक पाटिल इस घटना को याद करते हुए बताते हैं कि उनके पिता ने उन्हें साल 1961के पहले गणेश प्रतिमा स्थापना के बारे में बताया था.

पाटिल बताते हैं, “उस साल के बाद 1986 तक गणेश प्रतिमा को फिर से मस्जिद में स्थापित नहीं किया गया.”

साल 1986 में गांव के युवाओं का एक समूह पास के बावची गांव में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होने गया. इस कार्यक्रम में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही तरह के कलाकारों ने हिस्सा लिया था.

इस कार्यक्रम में दोनों समुदायों ने एक साथ मिलकर गणेश महोत्सव मनाया था, जिसे देखकर गांव के युवा प्रेरित हुए.

इसके बाद अपने गांव के इतिहास को याद करते हुए गोटखिंडी गांव के युवाओं ने तय किया कि वे मस्जिद में गणेश प्रतिमा को स्थापित करने की परंपरा को फिर से शुरू करेंगे.

युवाओं ने ‘गणेश मंडल’ नाम की एक समिति का गठन किया. इस समित के अध्यक्ष एक मुस्लिम युवक इलाही पठान बनाए गए.

सुभाष थोरात, अशोक शेजवाले और अर्जुन कोकाटे जैसे कुछ प्रमुख लोगों ने उत्सव की व्यवस्था करने में मदद की.

पहली पीढ़ी के साथ साल 1961 में जो शुरू हुआ था, उसे अब 1986 में दूसरी पीढ़ी ने फिर से शुरू किया था.

साल 1961 में गोटखिंडी गांव के बापूसाहेब पाटिल, श्यामराव थोराट, वसंतराव थोराट, निज़ाम पठान, खुदबुद्दीन जमादार, रामजन मुलानी और धोंडी पठान एक समूह के रूप में साथ आए और पहली बार एक मस्जिद के अंदर गणेश प्रतिमा स्थापित की थी.

इलाही पठान, अशोक पाटिल, सुभाष थोराट, अशोक शेजवाले, विजय काशिद और अर्जुन कोकाटे के नेतृत्व में इस समूह ने इस पहल में नई जान फूंक दी और गांव में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता और सद्भाव की विरासत को आगे बढ़ाया.

वर्तमान में गणेश थोराट, सागर शेजवाले और लखन पठान जैसे युवाओं के नेतृत्व में तीसरी पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है.

मुहर्रम और गणेश उत्सव

लाखन पठान बड़े गर्व से बताते हैं, “हमारा गांव एकता और सद्भाव से रहता है. हम जाति और धर्म के बँटवारे पर भरोसा नहीं करते.”

लाखन पठान का परिवार गणेश उत्सव की शुरुआत से ही उसमें शामिल हो रहा है.

गोटखिंडी गांव में हिंदू और मुस्लिम त्योहार एक साथ मनाए जाते हैं. दो बार ऐसा हुआ कि मुहर्रम और गणेश चतुर्थी एक ही दिन पड़े, उस समय गांव वालों ने पीर और गणपति का जुलूस एक साथ निकाला.

अशोक पाटिल इस एकता ही भावना को दोहराते हैं.

वो उन दिनों को याद करते हैं जब बक़रीद और गणेश चतुर्थी का त्योहार एक साथ मनाया गया था और हिंदुओं के सम्मान में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने पशु की बलि देने से मना कर दिया था.

पाटिल कहते हैं, “यह किसी पर कोई थोपी गई बात नहीं है. हमारे मुस्लिम भाइयों ने प्यार और सम्मान के लिए यह किया था.”

विभाजन का बीज बोने के प्रयास नाकाम

इस गांव की सभी कहानियां शांतिपूर्ण नहीं रही हैं.

अशोक और माज़िद पठान एक घटना को याद करते हैं जब गांव के बाहर से कुछ धार्मिक नेता आए और उन्होंने मुस्लिम समुदाय से गणेश उत्सव में शामिल नहीं होने का अनुरोध किया.

इन नेताओं ने चेतावनी देते हुए कहा कि यह इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ़ है.

हालांकि, गांव वाले अपनी बात पर अड़े रहे.

उन्होंने कहा, “हम कई सालों ने भाइयों की तरह रह रहे हैं और साथ मिलकर त्योहार मनाने की खुशी और ऊर्जा अनमोल है.”

इसके बाद बाहरी लोग निराश होकर चले गए.

गणेश उत्सव के शुरुआती सालों में गणपति का जुलूस बैलगाड़ी में निकाला जाता था. लेकिन वर्तमान में यह ट्रैक्टर में निकाला जाता है.

हालांकि, लोगों का उत्साह अभी भी वैसा ही है.

अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति की मूर्ति का विसर्जन करने के बाद पूरा गांव सामूहिक भोजन के लिए इकट्ठा होता है. 10 दिनों के दौरान हिंदू और मुस्लिम परिवार गणपति की आरती करते हैं.

गांव के रहने वाले गणेश थोरट कहते हैं, “हमारे गांव ने दूसरों के लिए एक उदाहरण पेश किया है. हमारे पूर्वजों की इस विरासत पर हमें गर्व है और सामाजिक सद्भाव की इस परंपरा को जारी रखना हमारी ज़िम्मेदारी है.”

कुरुन्दवाड़ की पांच मस्जिदें

पश्चिम महाराष्ट्र के कोल्हापुर ज़िले में बसे कुरुन्दवाड़ गांव में हर साल एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है.

गणपति उत्सव के दौरान यहां की पांच मस्जिदों में भगवान गणेश की प्रतिमा विराजी जाती है.

कुरुन्दवाड़ गांव का इतिहास पेशवा काल से जुड़ा रहा है. यह गांव कभी पटवर्धन परिवार के शासन के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण कस्बा था. यह परिवार पेशवाओं की ओर से शासन करता था.

पीढ़ियों से इस गांव में सभी जातियों, पंथों और धर्मों के लोग सौहार्द के साथ रहते आए हैं. इस गांव की पांच मस्जिदों- कुडेखान बडेनल, धेपनपुर, बैरागदार, शेलके और कारखाना मस्जिद में गणपति उत्सव के दौरान भगवान गणेश की मूर्ति विराजी जाती है.

यह एकता और साझा आस्था का एक प्रतीक है.

इस अनूठी परंपरा की शुरुआत गोटखिंडी गांव से मिलती-जुलती है.

साल 1982 में गणपति उत्सव के समय भारी बारिश के दौरान एक मस्जिद के पास स्थापित गणेश की प्रतिमा को बारिश से बचाने के लिए मस्जिद के अंदर ले जाया गया था.

उसी समय से भगवान गणेश की मूर्ति को त्योहार के समय कुरुन्दवाड़ गांव की सभी पांचों मस्जिदों में विराजा जाने लगा.

स्थानीय पत्रकार जमीर पठान ने अपने इस गौरव को साझा करते हुए कहा, “इस परंपरा को शुरू करने के लिए हमें अपने पूर्वजों पर गर्व है. यह उनकी ही विरासत है जो हमारे गांव को आज के विभाजनकारी समय में भी सामाजिक सद्भाव के साथ एकजुट रहने को प्रेरित करती है.”

“जबकि हमारे आस-पास की दुनिया ध्रुवीकृत हो सकती है, हमारा गांव भाईचारे और प्रेम से पनपता रहेगा.”

भाईचारे की विरासत

साल 2009 में कुरुन्दवाड़ गांव से मात्र 18 किलोमीटर दूर मिराज में गणपति महोत्सव के दौरान दंगे हुए. हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव बढ़ने से आसपास के क्षेत्र में अशांति फैल गई थी.

जिसके कारण इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया और दंगों को लेकर चिंताएं चरम पर थीं.

इन दंगों के बावज़ूद कुरुन्दवाड़ गांव में कोई भी बदलाव नहीं आया. गांव इस अराजकता से बचा रहा. गांव वालों की एकता की भावना अटूट थी और कर्फ्यू से दैनिक जीवन में कोई समस्या नहीं हुई.

हिंसा के खिलाफ़ एकजुटता और अवज्ञा दिखाते हुए गांव के लोग शांति मार्च के लिए एकजुट हुए. इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम एकता का एक बेहतरीन उदाहण पेश किया.

कुरुन्दवाड़ के रफ़ीक दबासे इस घटना को याद करते हुए कहते हैं, “हमने अपने गांव में भाईचारे को दिखाते हुए शांति की अपील की. हमारा रिश्ता तब भी मज़बूत था और अब भी अटूट है.”

रफ़ीक हर साल गणपति उत्सव का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं और अपने हिंदू पड़ोसियों के साथ अपना उत्साह साझा करते हैं.

उनके लिए गणपति का आना घर में किसी प्रिय मेहमान का स्वागत करने जैसा है. उनका मानना है कि यह त्योहार दोनों समुदायों के बीच संबंधों को मजबूत करता है.

अनंत चतुर्थी पर जब गणपति को विदाई देने का समय आता है तो हिंदुओं और मुस्लिमों सहित पूरा गांव भावुक हो जाता है.

रफ़ीक और गांव के अन्य लोगों का इस त्योहार के लिए जो जुड़ाव है, वह कुरुन्दवाड़ में भाईचारे की एक व्यापक और पुरानी परंपरा का हिस्सा है.

गांव के ही रहने वाले करीम पैलवान 1900 के दशक की शुरुआत की कहानियों को याद करते हैं, जब एक हिंदू पटवर्धन परिवार ने मुहर्रम के जुलूस में मुस्लिम समुदाय का समर्थन किया था.

करीम बताते हैं, “उस समय मुख्य गणपति की मूर्ति हमारे गांव के मुखिया बालासाहेब पटवर्धन के घर में रखी गई थी. मुहर्रम के दौरान जुलूस भी उनके घर आता था. पटवर्धन परिवार ने गणेश चतुर्थी और मुहर्रम को बराबर उत्साह के साथ मनाया.”

वो बताते हैं, “इस दौरान गांव में भोज कराया गया. यह बालासाहेब पटवर्धन ही थे जिन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता के बीज बोए और जिसे हम आज संजोकर रखते हैं. हमें इस विरासत पर गर्व है और इसका संरक्षण करते हैं.”

कुरुन्दवाड़ गांव में एक बार फिर साल 2018, 2019, 2020 में गणेश चतुर्थी और मुहर्रम एक साथ पड़े.

गांव के निवासी जमीर पठान बताते हैं, “हमने दोनों परंपराओं के मुताबिक़ गणपति के लिए मोदक और मुहर्रम के लिए चोंगा तैयार करवाया और उसे बाँटा. गांव के लोग दोनों मौकों पर समान उत्साह के साथ एकजुट होते थे.”

कुरुन्दवाड़ गांव में यह परंपरा साल 1982 से चल रही है.


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