तो इसका मतलब मेरी शादी मान्य नहीं है?” मेरी सहेली गायत्री ने मुझसे सवाल किया?
उसने ये सवाल हिंदू विवाह पर सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी के बारे में पढ़ने के बाद किया था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हिंदू विवाह एक ‘संस्कार’ है और ये एक समारोह के जरिये सही तरीके से पूरा होना चाहिए.
हिंदू विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत ही मान्यता मिलती है.
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हमारी बातचीत से मुझे ये याद आया कि मेरी दोनों बहनों की शादी में हमने वो समारोह नहीं किया था, जिसमें वर पक्ष के मेहमानों के पांव धोए जाते हैं.
तो क्या इसका मतलब ये निकाला जाना चाहिए ये शादियां अमान्य हैं?
इसका फौरी ज़वाब है- नहीं. लेकिन इसका विस्तार से जवाब आपको इस लेख को पढ़ने के दौरान मिलेगा.
आइए पहले उस केस के बारे में जानते हैं, जिससे ये बहस शुरू हुई.
कानून इस मामले में स्पष्ट है. ये किसी कर्मकांड या समारोह का ज़िक्र नहीं करता. हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 7 कहती है कि हिंदू विवाह वर-वधू में से किसी भी पक्ष के पारंपरिक अनुष्ठानों और समारोहों के जरिये हो सकता है.
वीणा एक उदाहरण देती हैं. वो कहती हैं, “कर्नाटक के कुछ समुदायों में लोग कावेरी नदी को साक्षी मान कर शादी करते हैं. कुछ शादियों में सूर्य को साक्षी माना जाता है. कई तरह के समारोह और अनुष्ठान होते हैं. कानून किसी खास अनुष्ठान या समारोह के बारे में नहीं कहता है कि इन्हें ही किया जाना चाहिए. ये सिर्फ ये कहता है कि शादी वर या वधू में से किसी भी पक्ष की परंपरा के मुताबिक समारोह करके शादी पूरी हो सकती है.”
हिंदू विवाह अधिनियम का धारा 3 में रीति-रिवाजों का परिभाषा दी गई है. यहां रीति-रिवाज और इनका पालन करने से मतलब ऐसे नियमों को पालन करना है जो लंबे समय से लगातार उसी रूप में माने जाते रहे हैं. और ये परंपराएं किसी समुदाय, जाति, समूह या परिवार में कानून का बल (यानी कानूनी मान्यताएं) हासिल कर चुकी हैं.
लेकिन सुप्रीम कोर्ट समेत भारतीय अदालतें सप्तपदी जैसी रस्मों पर इतना जोर क्यों दे रही है?
डॉ. सरसु थॉमस नेशनल लॉ स्कूल बेंगलुरु में प्रोफेसर हैं और जिनकी फैमिली लॉ और जेंडर कानून में विशेषज्ञता हासिल है. वो मानती हैं कि “सभी शादियां ब्राह्मण परंपराओं और रीति-रिवाजों के मुताबिक़ नहीं होती हैं. लेकिन ये सही है कि अदालतें ब्राह्मण परंपराओं और रीति-रिवाजों को ही देख रही हैं.”
वो कहती हैं, “मैं समझती हूं कि जहां-जहां कोर्ट ने सप्तपदी या होम करने पर जोर दिया है वो कुछ मामलों में ठीक नहीं है. कुछ लोग ये मान सकते हैं कि मंगलसूत्र बांधना सप्तपदी के बराबर का अनुष्ठान या परंपरा नहीं है.”
हालांकि वो कहती हैं, “अगर वर या वधू में से किसी पक्ष के अनुष्ठान,परंपरा या रीति-रिवाज के साथ शादी की जाती है तो शादी हिंदू विवाह अधिनियम के तहत शादी मानी जाएगी.”

