बीकानेर। अभी गर्मी शुरू भी नहीं हुई कि देश के कई हिस्सों से पानी की किल्लत की खबरें आ रही हैं. इस बीच हम लगातार टॉप चावल एक्सपोर्टर बने हुए हैं. इन दोनों बातों का सीधा कनेक्शन है. साल 2014-15 में भारत ने 37 लाख टन बासमती चावल दूसरे देशों को भेजा. लेकिन इसके साथ ही 10 ट्रिलियन लीटर पानी भी चला गया. ये वो पानी है, जो चावल की खेती में खर्च हुआ. ये वर्चुअल वॉटर ट्रेडिंग है. कई देशों ने ऐसी फसलें उपजानी लगभग बंद कर दीं, जो ज्यादा पानी पीती हैं.
इस तरह शुरू हुई वर्चुअल पानी पर बात
नब्बे के दशक में कई देशों ने एक नया काम किया. उनके पास उपजाऊ जमीन थी, और पानी भी था, लेकिन वे खेती, खासकर चावल, रूई और गन्ने की खेती से बचने लगे. वे इन चीजों को भारी कीमत पर दूसरे देशों से खरीदने लगे. लेकिन इसमें उनका घाटा नहीं था, बल्कि दूर की रणनीति थी. वे देश असल में अपना पानी बचाते हुए दूसरे देशों में जल-संकट पैदा कर रहे थे.
प्रोडक्ट के पीछे कितना पानी लग रहा
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अगर कोई देश या कंपनी कोई ऐसा प्रोडक्ट बनाती है, जो ज्यादा पानी खर्च करता हो, तो ये कंपनी पर ही बोझ नहीं, बल्कि इसका असर दुनिया पर भी होगा. जमीन से पानी घटता जाएगा. ये बात नजर भी आने लगी है. जैसे कर्नाटक या पंजाब ही बात लें तो फिलहाल वहां पानी की किल्लत हो रही है. ये वहां गन्ने और चावल की पैदावार का नतीजा है. पंजाब का भी यही हाल है, जो चावल की पैदावार करता रहा.
इसका दूसरा पक्ष देखें
अगर कोई देश गेहूं या चावल का आयात करता है तो वो उसके साथ ही अनाज की पैदावार में लगने वाला पानी भी वर्चुअली आयात कर रहा है. जबकि खुद उसके यहां पानी की बचत हो रही है. ये दोहरा फायदा है, जबकि एक्सपोर्टर देश को नुकसान है.
ये देश बचा रहे पानी
मिस्र में नील नदी है, जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी नदी है. किसी समय वहां चावल, कपास और सोया की जमकर खेती हुई. लेकिन पानी की कमी के बाद इस देश ने वॉटर -इंटेसिव फसलें उगानी कम कर दीं. यहां तक कि कई बार इस देश में चावल उगाने पर किसानों पर फाइन भी लगाया गया. चीन के पास दुनिया की तीसरी बड़ी नदी यांग्शी है, लेकिन वो भी ऐसी चीजें आयात करने पर जोर दे रहा है, जो पानी के मामले में खर्चीली हों. साथ ही वो लगातार ऐसी तकनीकें भी बना रहा है, जो कम पानी में ज्यादा उपज दे सकें.
वर्चुअल वॉटर बचाने के लिए कई देश तकनीकें बना रहे हैं. वे कम पानी के खर्च पर चावल, रूई और दलहन की खेती करने लगे हैं. ऐसी ही एक तकनीक है- सिस्टम ऑफ राइस इन्टेंसिफिकेशन. इसमें मिट्टी की क्वालिटी बढ़ाकर और वीड कंट्रोल के जरिए पानी की बचत की जा रही है. कई दूसरी भी तकनीकें हैं, जो कम खर्च में फसलें उगाती हैं.

