बीकानेर: ‘म्हारी गणगौर’ उत्सव के दूसरे दिन ‘रमक झमक’ के तत्वावधान में आधुनिक दौर में गणगौर की महत्ता पर एक परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में युवतियों ने अपने विचार साझा किए, वहीं वरिष्ठ महिलाओं ने अपने अनुभव और संस्मरण सुनाए। कई प्रतिभागियों ने गणगौर से जुड़े पारंपरिक गीतों और रचनाओं की प्रस्तुति भी दी।
कार्यक्रम की शुरुआत अध्यक्ष प्रहलाद ओझा भैरूं ने विषय प्रवर्तन के साथ की। उन्होंने कहा कि गणगौर महिलाओं का प्रमुख उत्सव है, जिसमें गीत और नृत्य की विशेष भूमिका होती है। उन्होंने चिंता जताई कि समय के साथ पारंपरिक गीतों की राग और शैली धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है।
वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं को स्वयं अपनी मंडलियां बनाकर पारंपरिक गीतों को जीवित रखना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी भी इससे जुड़ सके। वरिष्ठ महिलाओं किरण सोनी और राजकुमारी व्यास ने कहा कि परंपराओं को आगे बढ़ाने में परिवार की महिलाओं की अहम भूमिका है।
अन्य वक्ताओं ने आधुनिकता के साथ परंपरा को संतुलित रखने की आवश्यकता पर बल दिया। ‘म्हारी गणगौर’ पुस्तक और उसमें दिए गए क्यूआर कोड के माध्यम से गीतों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल को सराहा गया।
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कार्यक्रम के दौरान गणगौर और मातृत्व पर आधारित रचनाओं की प्रस्तुति भी दी गई। मुख्य अतिथि के रूप में योग प्रशिक्षक पिंकी जैन और विशिष्ट अतिथि आरती आचार्य मौजूद रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता राम कंवरी ओझा ने की, जबकि संयोजक ज्योति स्वामी ने आभार व्यक्त किया।
इससे पहले गवरजा का पूजन, आरती और ‘खोल भराई’ की रस्म निभाई गई तथा पारंपरिक गीतों के साथ उत्सव का उल्लासपूर्ण माहौल बना रहा।

