मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब एक बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुका है। हालिया घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच विवाद का केंद्र अब परमाणु कार्यक्रम बन चुका है। इस बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump के बयान ने इस मुद्दे को और अधिक चर्चा में ला दिया है।
ट्रंप का तीखा बयान क्या संकेत देता है?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने हालिया बयान में कहा कि अमेरिका किसी भी तरह की जल्दबाजी में नहीं है। उनका दावा है कि ईरान खुद बातचीत के लिए पहल कर रहा है और दबाव में है।
ट्रंप ने मीडिया रिपोर्ट्स को खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका ने बातचीत के लिए कोई पहल नहीं की है, बल्कि ईरान बार-बार समझौते की कोशिश कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान सार्वजनिक रूप से भले ही इनकार कर रहा हो, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है।
उनके अनुसार, ईरान बातचीत में तो सक्षम है, लेकिन युद्ध की स्थिति में कमजोर साबित हो सकता है।
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ईरान का जवाब: बातचीत से इनकार
दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि ईरान ने न तो किसी प्रकार की वार्ता की है और न ही ऐसी कोई योजना बनाई है। हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि अमेरिका ने कुछ अन्य देशों के जरिए संदेश भेजने की कोशिश की थी, लेकिन इसे औपचारिक बातचीत नहीं माना जा सकता।
27 मार्च क्यों है अहम?
स्थिति इसलिए और गंभीर हो गई है क्योंकि 27 मार्च को एक अहम समयसीमा खत्म हो रही है।
23 मार्च को ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान के साथ बातचीत “सकारात्मक और रचनात्मक” दिशा में बढ़ रही है। इसी के चलते उन्होंने ईरान के ऊर्जा ठिकानों पर संभावित हमले को 5 दिनों के लिए टाल दिया था।
अब इस समयसीमा के समाप्त होने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कूटनीति आगे बढ़ती है या हालात और बिगड़ते हैं।
क्या आगे बढ़ेगा तनाव या बनेगी डील?
मौजूदा हालात बेहद नाजुक हैं। एक तरफ बयानबाजी तेज हो रही है, वहीं दूसरी तरफ दोनों देश सीधे टकराव से बचने की कोशिश करते भी नजर आ रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि परमाणु मुद्दे पर सहमति बनाना आसान नहीं होगा, लेकिन वैश्विक दबाव दोनों देशों को बातचीत की टेबल तक ला सकता है।

