भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर केंद्र सरकार ने नए आधिकारिक दिशानिर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के अनुसार अब राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ से पहले ‘वंदे मातरम’ का गायन या वादन अनिवार्य रूप से किया जाएगा। यह निर्णय आधिकारिक समारोहों, राष्ट्रीय पर्वों और सरकारी आयोजनों में लागू होगा। भाजपा सांसदों ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए इसका स्वागत किया है।
क्या हैं नए दिशानिर्देश?
गृह मंत्रालय द्वारा जारी प्रोटोकॉल के मुताबिक, राष्ट्रीय ध्वज फहराने, राष्ट्रपति के आगमन, उनके भाषण या राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले और बाद में ‘वंदे मातरम’ का गायन किया जाएगा।
सरकारी स्कूलों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य औपचारिक सरकारी कार्यक्रमों में भी यह नियम लागू रहेगा। खास बात यह है कि आधिकारिक अवसरों पर अब ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंद गाए या बजाए जाएंगे, जिनकी कुल अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड निर्धारित की गई है।
भाजपा नेताओं की प्रतिक्रिया
भाजपा सांसद शशांक मणि त्रिपाठी ने कहा कि ‘वंदे मातरम’ भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है। उनका मानना है कि यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जनभावनाओं का स्वर रहा है और इसे पूर्ण रूप से प्रस्तुत करना देश की ऐतिहासिक विरासत को सम्मान देने जैसा है।
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वहीं भाजपा सांसद संजय जायसवाल ने कहा कि आजादी की लड़ाई में ‘वंदे मातरम’ ने क्रांतिकारियों को ऊर्जा दी थी। उन्होंने इसे सकारात्मक और ऐतिहासिक कदम बताया।
‘वंदे मातरम’ का ऐतिहासिक सफर
‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में की थी। यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंद मठ’ में प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास में मातृभूमि को देवी स्वरूप में प्रस्तुत किया गया, जिसने स्वतंत्रता सेनानियों में देशभक्ति की भावना को मजबूत किया।
1905: आंदोलन का स्वर
7 अगस्त 1905 को बंगाल विभाजन के विरोध में निकले विशाल जुलूस में पहली बार ‘वंदे मातरम’ को राजनीतिक नारे के रूप में व्यापक पहचान मिली। इसके बाद यह गीत ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन गया।
कोलकाता, रंगपुर, बारीसाल, लाहौर, मुंबई और पुणे सहित देश के कई हिस्सों में आंदोलनकारियों ने इसे स्वतंत्रता के घोष के रूप में अपनाया।
विवाद और संशोधन
1930 के दशक में इस गीत के कुछ छंदों को लेकर विवाद सामने आया। मुस्लिम लीग की ओर से यह आपत्ति जताई गई कि गीत के कुछ हिस्सों में देवी-स्वरूप वर्णन धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है।
1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रीय आयोजनों में केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे। बाद में संविधान सभा ने भी इसी प्रारूप को स्वीकार किया।
राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का दर्जा
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान होगा, जबकि ‘वंदे मातरम’ को समान सम्मान के साथ राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जाएगा। इस घोषणा के साथ दोनों रचनाओं को राष्ट्रीय पहचान मिली।
वर्तमान निर्णय का महत्व
विशेषज्ञों का मानना है कि नए दिशानिर्देश ऐतिहासिक संदर्भों को पुनः प्रमुखता देने का प्रयास हैं। स्वतंत्रता संग्राम में ‘वंदे मातरम’ की भूमिका को देखते हुए इसे औपचारिक आयोजनों में पूर्ण रूप से शामिल करना सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इस निर्णय को लेकर बहस भी संभव है, लेकिन केंद्र सरकार का उद्देश्य इसे राष्ट्रीय एकता और विरासत से जोड़कर प्रस्तुत करना है।
संपूर्ण ‘वंदे मातरम’ (छह छंद)
(यहां पाठकों की सुविधा के लिए आधिकारिक रूप से स्वीकृत छह छंदों का संपूर्ण पाठ शामिल किया जा सकता है, जैसा कि सरकार ने जारी किया है।)
निष्कर्ष
‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। नए दिशानिर्देशों के साथ यह एक बार फिर औपचारिक राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में आ गया है। आने वाले समय में यह निर्णय सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है।

