पंचायतीराज चुनाव और ग्राम पंचायतों की भूमिका के बारे में आमतौर पर सभी जानते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को यह जानकारी है कि भारत में पंचायतीराज व्यवस्था की औपचारिक शुरुआत कहां से हुई थी। यह ऐतिहासिक शुरुआत राजस्थान के नागौर जिले से हुई थी, जिसने देश में ग्रामीण स्वशासन की दिशा तय की।
नागौर से शुरू हुई पंचायतीराज की ऐतिहासिक यात्रा
नागौर शहर के पुलिस लाइन परिसर में स्थित पंचायतीराज स्मारक वह स्थान है, जहां 2 अक्टूबर 1959 को भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पंचायतीराज व्यवस्था का औपचारिक उद्घाटन किया था। इसी स्थान पर बने एक साधारण लेकिन ऐतिहासिक चबूतरे से देश में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की नींव रखी गई।
इस आयोजन के साथ ही राजस्थान देश का पहला राज्य बना, जहां पंचायतीराज प्रणाली को लागू किया गया। बाद में यही मॉडल पूरे भारत में अपनाया गया।
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गांधी के ग्राम स्वराज से जुड़ा है पंचायतीराज
पंचायतीराज व्यवस्था की परिकल्पना महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ के विचार से प्रेरित थी। इसका उद्देश्य गांवों को आत्मनिर्भर बनाना और निर्णय लेने की शक्ति स्थानीय स्तर तक पहुंचाना था। नागौर से हुई यह शुरुआत भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई।
पंचायतीराज चबूतरे का ऐतिहासिक महत्व
यह चबूतरा केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है, जिसने गांवों को शासन में भागीदारी का अधिकार दिया। इसी स्थान से ग्रामीण विकास, स्थानीय नेतृत्व और जनभागीदारी को संवैधानिक मान्यता मिलने की दिशा तय हुई।
वर्तमान स्थिति और संरक्षण की जरूरत
आज पंचायतीराज चबूतरा एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसके संरक्षण और समुचित विकास को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इतिहास प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि इस स्थल को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और पर्यटन मानचित्र पर लाने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इसके महत्व को समझ सकें।
क्यों खास है नागौर
नागौर न केवल पंचायतीराज की जन्मस्थली है, बल्कि यह स्थान भारतीय लोकतंत्र के उस अध्याय का साक्षी है, जिसने गांवों को सत्ता के केंद्र से जोड़ा। यही वजह है कि पंचायतीराज स्मारक को राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है।


