ईरान में जनवरी की शुरुआत से जारी सरकार विरोधी प्रदर्शनों ने पूरे देश को अस्थिरता के दौर में धकेल दिया है। बढ़ती महंगाई, राजनीतिक दमन और नागरिक अधिकारों के सीमित होते दायरे को लेकर जनता में लंबे समय से गुस्सा पनप रहा था, जो अब सड़कों पर खुलकर सामने आ गया है।
हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट ने हालात की गंभीरता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है। विपक्ष समर्थित मीडिया संस्थान Iran International के अनुसार, 8 और 9 जनवरी को ईरानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों पर बेहद सख्त कार्रवाई की, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों की मौत होने का दावा किया गया है।
दो दिनों में 36 हजार मौतों का आरोप
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन दो दिनों के भीतर करीब 36,000 लोगों की जान गई। यह आंकड़ा कथित तौर पर फील्ड रिपोर्ट्स, अस्पतालों से मिली जानकारी, मेडिकल स्टाफ, प्रत्यक्षदर्शियों और पीड़ित परिवारों की गवाही के आधार पर तैयार किया गया है। हालांकि, ईरानी सरकार ने इन दावों को सिरे से खारिज किया है और इसे “प्रोपेगेंडा” बताया है।
IRGC पर गंभीर आरोप
प्रदर्शनों को दबाने में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की भूमिका को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि कई शहरों में सुरक्षा बलों ने सीधे गोलीबारी की और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां कीं। इंटरनेट सेवाओं पर रोक और मीडिया कवरेज को सीमित करने के प्रयासों ने स्थिति को और संदिग्ध बना दिया है।
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सुप्रीम लीडर की सुरक्षा बढ़ी
बढ़ते विरोध और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। राजधानी तेहरान समेत कई प्रमुख शहरों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं। मानवाधिकार संगठनों ने इस पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र और कई पश्चिमी देशों ने ईरान से संयम बरतने और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करने की अपील की है। वहीं, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह हाल के वर्षों में सबसे खूनी नागरिक आंदोलनों में से एक होगा।
फिलहाल, ईरान में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं और दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव किस दिशा में जाता है।

