नई दिल्ली। भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुआ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) केवल एक कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और वैश्विक व्यापार रणनीति के लिए बड़ा मोड़ साबित हो सकता है। 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर इस ऐतिहासिक समझौते को अंतिम रूप दिया गया, जिसे उद्योग जगत और विशेषज्ञ ‘गेमचेंजर डील’ मान रहे हैं।
बिना अतिरिक्त निवेश के बढ़ेगा निर्यात
एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अपनी मौजूदा विनिर्माण क्षमता में कोई अतिरिक्त निवेश किए बिना यूरोपीय संघ को 10 से 11 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त निर्यात कर सकता है। यह लाभ अमेरिका को भेजे जाने वाले उच्च टैरिफ वाले उत्पादों को यूरोपीय बाजार की ओर मोड़कर हासिल किया जाएगा। पिछले तीन वर्षों से भारत-EU के बीच माल व्यापार लगभग 136.5 अरब डॉलर पर स्थिर था, ऐसे में यह समझौता व्यापार को नई गति दे सकता है।
EU बना भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार
वित्त वर्ष 2025 में यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा द्विपक्षीय व्यापारिक भागीदार बनकर उभरा, जिसने अमेरिका को मामूली अंतर से पीछे छोड़ा। हालांकि, EU के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी अभी सिर्फ 2.9 प्रतिशत है, जो यह संकेत देती है कि संभावनाएं काफी ज्यादा हैं।
लग्जरी कारें, वाइन और चॉकलेट होंगी सस्ती
इस समझौते का सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा। BMW, Mercedes, Audi और Volkswagen जैसी यूरोपीय लग्जरी कारों पर आयात शुल्क को चरणबद्ध तरीके से 110 प्रतिशत से घटाकर लगभग 40 प्रतिशत तक लाने की योजना है। इससे कारों की कीमतों में 10 से 20 प्रतिशत तक की गिरावट संभव है।
इसके अलावा फ्रांस की वाइन, इटली का चीज़ और बेल्जियम की चॉकलेट भी अब भारतीय बाजार में अपेक्षाकृत सस्ती मिल सकेंगी।
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भारतीय उद्योग को यूरोप में मिलेगा बड़ा बाजार
समझौते के तहत भारत के टेक्सटाइल, कृषि उत्पाद और फार्मास्युटिकल सेक्टर को यूरोपीय संघ के 27 देशों में लगभग ‘जीरो ड्यूटी’ एक्सेस मिलेगा। इससे भारतीय उत्पाद ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे और निर्यात में बड़ा उछाल आने की संभावना है। उद्योग संगठनों CII और FICCI ने इसे निवेश और रोजगार के लिहाज से ऐतिहासिक कदम बताया है।
चीन पर निर्भरता घटाने की रणनीति
विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील केवल आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। यूरोपीय संघ अपनी सप्लाई चेन में चीन पर निर्भरता कम करना चाहता है और भारत को एक भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में देख रहा है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को वैश्विक पहचान मिलेगी और यूरोपीय कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा सकती हैं।
निवेश और रोजगार को मिलेगा बल
यूरोपीय संघ पहले से ही भारत के प्रमुख निवेशकों में शामिल है। वर्ष 2000 से 2024 के बीच EU से भारत में 119 अरब डॉलर से अधिक का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया है। FTA के बाद निवेश और रोजगार के नए अवसर बनने की उम्मीद है।
आगे क्या?
सरकारी सूत्रों के अनुसार, सभी औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद नए टैरिफ नियम वित्तीय वर्ष 2026-27 से लागू हो सकते हैं। मार्च 2026 में ब्रुसेल्स में होने वाली उच्चस्तरीय बैठक में सर्विस सेक्टर और डेटा प्रोटेक्शन जैसे मुद्दों पर अंतिम चर्चा होगी।
कुल मिलाकर, भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता न केवल व्यापार बढ़ाने का माध्यम है, बल्कि यह बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को मजबूत करने वाला कदम भी माना जा रहा है।

