बीकानेर। बारानी क्षेत्रों में स्प्रिंकलर सिस्टम के जरिए सिंचाई पहुंचाने के उद्देश्य से वर्ष 2017 में शुरू की गई इंदिरा गांधी नहर परियोजना से जुड़ी सामुदायिक डिग्गी योजना आज भी अपने लक्ष्य से कोसों दूर है। करीब 1800 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी योजना को सितंबर 2018 तक पूरा किया जाना था, लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी एक भी खेत तक पानी नहीं पहुंच सका है। स्थिति यह है कि भारी खर्च के बावजूद किसान आज भी सिंचाई के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इस परियोजना को लेकर किसानों में गहरी नाराजगी है। किसानों का आरोप है कि बिना भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी किए ही डिग्गियों का निर्माण कर दिया गया। न तो उन्हें मुआवजा मिला और न ही सिंचाई का लाभ। कई स्थानों पर डिग्गियां पानी भरे बिना ही धंसने लगी हैं, जिससे निर्माण गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जांच के आदेश, लेकिन कार्रवाई शून्य
लोकायुक्त में की गई शिकायत के बाद 24 नवंबर 2025 को जांच समिति का गठन किया गया था। समिति में सतर्कता एवं गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े वरिष्ठ अभियंताओं को शामिल कर सात दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए थे। अतिरिक्त मुख्य अभियंता सतर्कता सुनील कटारिया द्वारा गठित इस समिति के बावजूद अब तक न तो जांच शुरू हो सकी है और न ही कोई रिपोर्ट सामने आई है। किसानों का कहना है कि यह पूरा मामला लीपापोती में दबाया जा रहा है।
रणधीसर माइनर क्षेत्र के किसान गोपाल सिंह का आरोप है कि निर्माण कंपनी और विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ है। उनका कहना है कि कोई भी अधिकारी वास्तविक स्थिति सामने लाने को तैयार नहीं है। किसानों का प्रतिनिधिमंडल जल्द ही मुख्यमंत्री और सिंचाई मंत्री से मिलकर मामले की निष्पक्ष जांच एसीडी या ईडी से कराने की मांग करेगा।
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परियोजना की स्थिति एक नजर में
यह योजना छह लिफ्ट नहरों के माध्यम से करीब 3.47 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बूंद-बूंद सिंचाई उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई थी। अब तक लगभग 918 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। पहले चरण में 668 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि दूसरे चरण के लिए 250 करोड़ रुपये प्रस्तावित हैं। एक डिग्गी पर औसतन 1.25 करोड़ रुपये खर्च हुए और अब तक 304 डिग्गियां बनाई जा चुकी हैं।
किसानों की पीड़ा
किसानों का कहना है कि इस परियोजना ने उनकी हालत सुधारने के बजाय और बिगाड़ दी है। किसान करणी सिंह के अनुसार, पहले किसी तरह फसल हो जाती थी, लेकिन पिछले कई वर्षों से पानी की स्थिति इतनी खराब है कि खेती लगभग बंद हो गई है। वहीं किसान नेतराम शर्मा का कहना है कि डिग्गियों और नहरों की बदहाली के कारण रास्ते बंद हो गए हैं और किसानों की कीमती जमीनें बेकार हो गई हैं।
विभाग और कंपनी का पक्ष
नहर विभाग का कहना है कि योजना में देरी का कारण बजट की कमी और विद्युत कनेक्शन में विलंब रहा। विभाग के अनुसार अब तक 176 ट्रांसफार्मर लगाए जा चुके हैं और शेष कनेक्शन की प्रक्रिया जारी है। अधिकारियों का दावा है कि निर्माण कार्य गारंटी अवधि में है और गुणवत्ता संबंधी खामियों को सुधारा जाएगा।
वहीं निर्माण कंपनी लक्ष्मी कंस्ट्रक्शन कंपनी का कहना है कि सर्वे रिपोर्ट के अनुसार किसानों की सहमति से कार्य किया गया और मुआवजा डीएलसी दरों से अधिक दिया गया। कंपनी के अनुसार बिजली कनेक्शन नहीं मिलने के कारण डिग्गियों में पानी नहीं आ सका, जिससे समय के साथ उनमें खामियां आई हैं।
आगे क्या?
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही मरम्मत कार्य पूरा कर डिग्गियों, माइनरों और खालों को दुरुस्त किया जाएगा। किसानों को राहत देने का भरोसा दिलाया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आठ साल बाद भी करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सिंचाई का सपना अधूरा ही बना हुआ है।

