मोहन भागवत का यू-टर्न और बीजेपी पर तंज़
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 28 अगस्त को स्पष्ट कर दिया कि उनका रिटायर होने का कोई इरादा नहीं है। इस बयान से पहले, भागवत ने 75 वर्ष की उम्र में रिटायरमेंट की बात की थी, जिससे यह सवाल उठने लगा था कि क्या वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इशारे में कुछ कह रहे हैं, क्योंकि मोदी भी इस साल 75 साल के हो रहे हैं।
आरएसएस की 100वीं वर्षगांठ के मौके पर दिल्ली में आयोजित व्याख्यानमाला के अंतिम दिन, भागवत ने इस मुद्दे पर सफाई दी। उन्होंने कहा कि रिटायरमेंट की बात उन्होंने केवल मोरोपंत पिंगले के हवाले से की थी और यह किसी विशेष व्यक्ति के संदर्भ में नहीं थी। भागवत ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “संघ में जो कार्य सौंपा जाता है, उसे करना हर स्वयंसेवक का कर्तव्य है, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो।”
आरएसएस और बीजेपी के रिश्ते पर मोहन भागवत का बयान
आरएसएस प्रमुख ने बीजेपी के साथ अपने रिश्तों को लेकर भी कुछ महत्वपूर्ण बातें कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ और बीजेपी के बीच कोई झगड़ा नहीं है, हालांकि मतभेद हो सकते हैं। भागवत के अनुसार, “कुर्सी पर बैठा व्यक्ति पूरी तरह हमारे पक्ष में भी हो, तो भी उसे काम करना होता है।” साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि संघ के स्वयंसेवक कभी भी सेवा से निवृत्त होने को तैयार नहीं रहते और जो काम दिया जाता है, वह हमेशा करना होता है।
हालांकि, उनकी इस टिप्पणी ने कुछ विश्लेषकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि बीजेपी के अध्यक्ष के चुनाव में हो रही देरी से संघ खुश नहीं है। इस पर विजय त्रिवेदी ने कहा, “संघ और बीजेपी के बीच अब अध्यक्ष पद को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।”
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काशी और मथुरा पर मोहन भागवत का नया बयान
भागवत से पूछा गया कि क्या काशी और मथुरा के मंदिर-मस्जिद विवाद पर उनका कोई नया रुख है, क्योंकि पहले उन्होंने कहा था कि संघ इस आंदोलन में शामिल नहीं होगा। भागवत ने इस बार साफ कहा, “संघ काशी और मथुरा के मुद्दे पर कोई आंदोलन नहीं करेगा, लेकिन संघ के स्वयंसेवक, जो हिंदू हैं, अगर वे यह करना चाहते हैं तो कर सकते हैं।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि, “हिंदू समाज में काशी, मथुरा, और अयोध्या का महत्व है। यह एक भावना का सवाल है और इस पर कोई विवाद नहीं हो सकता।”
उनका यह बयान इस तरफ इशारा करता है कि संघ ने स्वयंसेवकों को इस विषय पर आंदोलन करने की स्वीकृति दी है, लेकिन संघ खुद इस तरह के आंदोलनों का हिस्सा नहीं बनेगा। उनके अनुसार, “हम हर जगह मंदिर ढूंढने की सलाह नहीं देते, लेकिन काशी और मथुरा पर यह मामला अलग है।”
संघ और बीजेपी के बीच हो रही राजनीति
इस पूरे बयान से यह भी प्रतीत होता है कि संघ और बीजेपी के बीच कुछ मुद्दों पर विचारधारा के अंतर हैं। बीजेपी के अध्यक्ष के चुनाव में हो रही देरी पर भागवत के तंज से यह जाहिर होता है कि संघ को इस देरी से कोई संतोषजनक स्थिति नहीं मिली है। सुमन गुप्ता ने इसे “राजनीतिक चाशनी में लपेटा गया मुद्दा” माना, जिसमें संघ की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, संघ और बीजेपी के बीच किसी भी तरह के वैचारिक मतभेद को सुलझाने की आवश्यकता है, क्योंकि इन दोनों संगठनों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच राजनीतिक दबाव लगातार बना रहता है।
निष्कर्ष
मोहन भागवत के इन बयानों ने न केवल आरएसएस और बीजेपी के रिश्तों पर एक नई चर्चा को जन्म दिया है, बल्कि काशी और मथुरा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी नई दृष्टिकोण पेश की है। जहां एक ओर उन्होंने रिटायरमेंट पर अपने बयान से यू-टर्न लिया, वहीं दूसरी ओर बीजेपी के अध्यक्ष के चुनाव पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। संघ के स्वयंसेवकों को काशी-मथुरा पर आंदोलन की अनुमति देने की बात से यह स्पष्ट होता है कि संघ भविष्य में इन मुद्दों पर अपनी रणनीति बदल सकता है।